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Rigveda Mandal 4 / Sukta 56 / Mantra 3

58 Sukta
7 Mantra
4/56/3
Devata- द्यावापृथिव्यौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स इत्स्वपा॒ भुव॑नेष्वास॒ य इ॒मे द्यावा॑पृथि॒वी ज॒जान॑। उ॒र्वी ग॑भी॒रे रज॑सी सु॒मेके॑ अवं॒शे धीरः॒ शच्या॒ समै॑रत् ॥३॥

सः । इत् । सु॒ऽअपाः॑ । भुव॑नेषु । आ॒स॒ । यः । इ॒मे इति॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । ज॒जान॑ । उ॒र्वी इति॑ । ग॒भी॒रे इति॑ । रज॑सी॒ इति॑ । सु॒मेके॒ इति॑ सु॒ऽमेके॑ । अ॒वं॒शे । धीरः॑ । शच्या॑ । सम् । ऐ॒र॒त् ॥

Mantra without Swara
स इत्स्वपा भुवनेष्वास य इमे द्यावापृथिवी जजान। उर्वी गभीरे रजसी सुमेके अवंशे धीरः शच्या समैरत् ॥

सः। इत्। सुऽअपाः। भुवनेषु। आस। यः। इमे इति। द्यावापृथिवी इति। जजान। उर्वी । गभीरे इति। रजसी । सुमेके इति सुऽमेके। अवंशे। धीरः। शच्या। सम्। ऐरत् ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 8 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! आप लोगों को (यः) जो (स्वपाः) श्रेष्ठ कर्म्मों से युक्त (धीरः) धीर जगदीश्वर (भुवनेषु) लोकों में (आस) विद्यमान है (इमे) इन (उर्वी) बहुत पदार्थों से युक्त (गभीरे) गाम्भीर्य्य आदि गुणसहित (रजसी) रजोवृन्दों से बनाये गये (सुमेके) एक हुए अर्थात् परस्पर सम्बन्धयुक्त (अवंशे) वंश अर्थात् उत्पत्तिक्रम से आगे को रहित और अन्तरिक्ष में स्थित (द्यावापृथिवी) सूर्य्य और भूमि को (जजान) उत्पन्न किया (शच्या) बुद्धि से (सम्, ऐरत्) कम्पाता अर्थात् क्रम से अनुकूल चलाता है (सः, इत्) वही सदा उपासना करने योग्य है ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस जगदीश्वर ने असङ्ख्य भूमि आदि लोक आकाश में रचे और व्यवस्था से चलाये हैं, वह सदा ही उपासना करने योग्य है ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥