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Rigveda Mandal 4 / Sukta 56 / Mantra 2

58 Sukta
7 Mantra
4/56/2
Devata- द्यावापृथिव्यौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दे॒वी दे॒वेभि॑र्यज॒ते यज॑त्रै॒रमि॑नती तस्थतुरु॒क्षमा॑णे। ऋ॒ताव॑री अ॒द्रुहा॑ दे॒वपु॑त्रे य॒ज्ञस्य॑ ने॒त्री शु॒चय॑द्भिर॒र्कैः ॥२॥

दे॒वी इति॑ । दे॒वेभिः॑ । य॒ज॒ते इति॑ । यज॑त्रैः । अमि॑नती॒ इति॑ । त॒स्थ॒तुः॒ । उ॒क्षमा॑णे॒ इति॑ । ऋ॒तव॑री॒ इत्यृ॒तऽव॑री । अ॒द्रुहा॑ । दे॒वपु॑त्रे॒ इति॑ दे॒वऽपु॑त्रे । य॒ज्ञस्य॑ । ने॒त्री इति॑ । शु॒चय॑त्ऽभिः । अ॒र्कैः ॥

Mantra without Swara
देवी देवेभिर्यजते यजत्रैरमिनती तस्थतुरुक्षमाणे। ऋतावरी अद्रुहा देवपुत्रे यज्ञस्य नेत्री शुचयद्भिरर्कैः ॥

देवी इति। देवेभिः। यजते इति। यजत्रैः। अमिनती इति। तस्थतुः। उक्षमाणे इति। ऋतवरी इत्यृतऽवरी। अद्रुहा। देवपुत्रे इति देवऽपुत्रे। यज्ञस्य। नेत्री इति। शुचयत्ऽभिः। अर्कैः ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 8 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (अर्कैः) सत्कार करने योग्य (शुचयद्भिः) पवित्रता को कहते हुए (यजत्रैः) मिलने योग्य (देवेभिः) श्रेष्ठ गुणों वा विद्वानों से जो (देवी) प्रकाशमान (अमिनती) नहीं हिंसा करनेवाले (ऋतावरी) बहुत सत्य से युक्त (अद्रुहा) नहीं द्रोह करने योग्य (देवपुत्रे) विद्वान् जन पुत्र जिनके वे (यज्ञस्य) संसार के व्यवहार के (नेत्री) चलानेवाले (उक्षमाणे) सब प्राणियों को सुखों से सींचते हुए (यजते) मिलने योग्य सूर्य्य और भूमि (तस्थतुः) स्थित होते हैं, उनको जान के जो व्यवहारों में संयुक्त करता है, वही भाग्यशाली होता है ॥२॥
Essence
जो मनुष्य पृथिवी से लेके प्रकृति अर्थात् प्रधानपर्य्यन्त पदार्थों को उनके गुण, कर्म्म, स्वभाव से यथावत् जान के कार्य्य की सिद्धि के लिये सम्प्रयोग करते हैं, वे सदा ही भाग्यशाली होते हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥