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Rigveda Mandal 4 / Sukta 56 / Mantra 1

58 Sukta
7 Mantra
4/56/1
Devata- द्यावापृथिव्यौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म॒ही द्यावा॑पृथि॒वी इ॒ह ज्येष्ठे॑ रु॒चा भ॑वतां शु॒चय॑द्भिर॒र्कैः। वत्सीं॒ वरि॑ष्ठे बृह॒ती वि॑मि॒न्वन्रु॒वद्धो॒क्षा प॑प्रथा॒नेभि॒रेवैः॑ ॥१॥

म॒ही । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । इ॒ह । ज्येष्ठे॒ इति॑ । रु॒चा । भ॒व॒ता॒म् । शु॒चय॑त्ऽभिः । अ॒र्कैः । यत् । सी॒म् । वरि॑ष्ठे॒ इति॑ । बृ॒ह॒ती इति॑ । वि॒ऽमि॒न्वन् । रु॒वत् । ह॒ । उ॒क्षा । प॒प्र॒था॒नेभिः॑ । एवैः॑ ॥

Mantra without Swara
मही द्यावापृथिवी इह ज्येष्ठे रुचा भवतां शुचयद्भिरर्कैः। वत्सीं वरिष्ठे बृहती विमिन्वन्रुवद्धोक्षा पप्रथानेभिरेवैः ॥

मही इति। द्यावापृथिवी इति। इह। ज्येष्ठे इति। रुचा। भवताम्। शुचयत्ऽभिः। अर्कैः। यत्। सीम्। वरिष्ठे इति। बृहती इति। विऽमिन्वन्। रुवत्। ह। उक्षा। पप्रथानेभिः। एवैः ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 8 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्) जो (विमिन्वन्) विशेष करके फेंकता हुआ (रुवन्) प्रशंसित शब्दवान् जैसे हो वैसे (ह) ही (उक्षा) सूर्य्य के समान विद्वान् (इह) यहाँ (सीम्) सब ओर से (शुचयद्भिः) पवित्र करते हुए (अर्कैः) सेवा करने योग्य और (पप्रथानेभिः) अत्यन्त विस्तारयुक्त (एवैः) सुख को प्राप्त करानेवाले गुणों के साथ वर्त्तमान (वरिष्ठे) अतीव श्रेष्ठ (बृहती) बढ़ते हुए (मही) बड़े (ज्येष्ठे) अत्यन्त प्रशंसा करने योग्य (रुचा) रुचिकर (द्यावापृथिवी) सूर्य्य और भूमि (भवताम्) होते हैं, उनको यथावत् विशेष करके जानता है, वही सब का कल्याण करनेवाला होता है ॥१॥
Essence
जो मनुष्य पृथिवी से लेके सूर्य्यपर्य्यन्त पदार्थों को जानते हैं, वे धनवान् होकर सब को सुखी करें ॥१॥
Subject
अब सात ऋचावाले छप्पनवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में द्यावापृथिवी अर्थात् प्रकाश और भूमि के गुणों को कहते हैं ॥