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Rigveda Mandal 4 / Sukta 55 / Mantra 9

58 Sukta
10 Mantra
4/55/9
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उषो॑ मघो॒न्या व॑ह॒ सूनृ॑ते॒ वार्या॑ पु॒रु। अ॒स्मभ्यं॑ वाजिनीवति ॥९॥

उषः॑ । म॒घो॒नि॒ । आ । व॒ह॒ । सूनृ॑ते । वार्या॑ । पु॒रु । अ॒स्मभ्य॑म् । वा॒जि॒नी॒ऽव॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
उषो मघोन्या वह सूनृते वार्या पुरु। अस्मभ्यं वाजिनीवति ॥

उषः। मघोनि। आ। वह। सूनृते। वार्या। पुरु। अस्मभ्यम्। वाजिनीऽवति ॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 7 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (उषः) प्रातःकाल के सदृश वर्त्तमान (सूनृते) सत्यवाणीयुक्त (मघोनि) प्रशंसित धन को करनेवाली (वाजिनीवति) उत्तम विद्या से युक्त पत्नी ! तू (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (पुरु) बहुत (वार्या) वर्त्ताव में लाने योग्य वस्तुओं को (आ, वह) सब प्रकार से प्राप्त कराओ ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रभातवेला सब जीवों की प्रिय करनेवाली है, वैसे ही विद्यायुक्त स्त्री सब को प्रिय होती है ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥