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Rigveda Mandal 4 / Sukta 55 / Mantra 8

58 Sukta
10 Mantra
4/55/8
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒ग्निरी॑शे वस॒व्य॑स्या॒ग्निर्म॒हः सौभ॑गस्य। तान्य॒स्मभ्यं॑ रासते ॥८॥

अ॒ग्निः । ई॒शे॒ । व॒स॒व्य॑स्य । अ॒ग्निः । म॒हः । सौभ॑गस्य । तानि॑ । अ॒स्मभ्य॑म् । रा॒स॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
अग्निरीशे वसव्यस्याग्निर्महः सौभगस्य। तान्यस्मभ्यं रासते ॥

अग्निः। ईशे। वसव्यस्य। अग्निः। महः। सौभगस्य। तानि। अस्मभ्यम्। रासते ॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 7 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वन् ! जैसे (अग्निः) अग्नि के सदृश पुरुषार्थी (वसव्यस्य) धनों में श्रेष्ठ का और जैसे (अग्निः) अग्नि (महः) बड़े (सौभगस्य) उत्तम ऐश्वर्य्य के होने की (ईशे) इच्छा करता है (तानि) उनको (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (रासते) देता है, वैसे आप करो ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो ! जैसे विद्या से उपजित अर्थात् वश में किया गया अग्नि, कार्य्यों को सिद्ध करके बड़े ऐश्वर्य्य को प्राप्त कराता है, वैसे ही सेवा किये गये आप लोग विद्या और उपदेश आदि कार्य्यों को सिद्ध करके सब को ऐश्वर्य्ययुक्त करो ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥