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Rigveda Mandal 4 / Sukta 55 / Mantra 5

58 Sukta
10 Mantra
4/55/5
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ पर्व॑तस्य म॒रुता॒मवां॑सि दे॒वस्य॑ त्रा॒तुर॑व्रि॒ भग॑स्य। पात्पति॒र्जन्या॒दंह॑सो नो मि॒त्रो मि॒त्रिया॑दु॒त न॑ उरुष्येत् ॥५॥

आ । पर्व॑तस्य । म॒रुता॑म् । अवां॑सि । दे॒वस्य॑ । त्रा॒तुः । अ॒व्रि॒ । भग॑स्य । पात् । पतिः॑ । जन्या॑त् । अंह॑सः । नः॒ । मि॒त्रः । मि॒त्रिया॑त् । उ॒त । नः॒ । उ॒रु॒ष्ये॒त् ॥

Mantra without Swara
आ पर्वतस्य मरुतामवांसि देवस्य त्रातुरव्रि भगस्य। पात्पतिर्जन्यादंहसो नो मित्रो मित्रियादुत न उरुष्येत् ॥

आ। पर्वतस्य। मरुताम्। अवांसि। देवस्य। त्रातुः। अव्रि। भगस्य। पात्। पतिः। जन्यात्। अंहसः। नः। मित्रः। मित्रियात्। उत। नः। उरुष्येत् ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 6 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! जैसे मैं (पर्वतस्य) मेघ के (देवस्य) उत्तम सुख प्राप्त करानेवाले के (भगस्य) ऐश्वर्य्य के (त्रातुः) रक्षा करनेवाले और (मरुताम्) मनुष्यों के (अवांसि) अनेक प्रकार रक्षणों का मैं (आ, अव्रि) स्वीकार करता हूँ, वैसे (पतिः) स्वामी आप (नः) हम लोगों की (जन्यात्) उत्पन्न होनेवाले (अंहसः) अपराध से (पात्) रक्षा करो और (नः) हम लोगों को (उत) तो (मित्रः) मित्र (मित्रियात्) मित्र से (उरुष्येत्) सेवन करे ॥५॥
Essence
जो मनुष्य सत्य के जानने और उसके आचरण करने की इच्छा करें, वे सत्य ज्ञान को प्राप्त होकर सत्य के आचरण करनेवाले होवें ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥