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Rigveda Mandal 4 / Sukta 55 / Mantra 2

58 Sukta
10 Mantra
4/55/2
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र ये धामा॑नि पू॒र्व्याण्यर्चा॒न्वि यदु॒च्छान्वि॑यो॒तारो॒ अमू॑राः। वि॒धा॒तारो॒ वि ते द॑धु॒रज॑स्रा ऋ॒तधी॑तयो रुरुचन्त द॒स्माः ॥२॥

प्र । ये । धामा॑नि । पू॒र्व्याणि॑ । अर्चा॑न् । वि । यत् । उ॒च्छान् । वि॒ऽयो॒तारः॑ । अमू॑राः । वि॒ऽधा॒तारः॑ । वि । ते । द॒धुः॒ । अज॑स्राः । ऋ॒तऽधी॑तयः । रु॒रु॒च॒न्त॒ । द॒स्माः ॥

Mantra without Swara
प्र ये धामानि पूर्व्याण्यर्चान्वि यदुच्छान्वियोतारो अमूराः। विधातारो वि ते दधुरजस्रा ऋतधीतयो रुरुचन्त दस्माः ॥

प्र। ये। धामानि। पूर्व्याणि। अर्चान्। वि। यत्। उच्छान्। विऽयोतारः। अमूराः। विऽधातारः। वि। ते। दधुः। अजस्राः। ऋतऽधीतयः। रुरुचन्त। दस्माः ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 6 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! (ये) जो (पूर्व्याणि) प्राचीन जनों से प्रत्यक्ष किये गये (धामानि) जन्म, नाम, स्थानों का (प्र, अर्चान्) उत्तम सत्कार करें और (यत्) जो (अमूराः) नहीं मूर्ख (वियोतारः) विभाग करनेवाले जन प्राचीन जनों से प्रत्यक्ष किये गये जन्म, नाम, स्थानों का (वि, उच्छान्) विवास करावें और जो (अजस्राः) नहीं हिंसा करने और (ऋतधीतयः) सत्य के धारण करनेवाले (विधातारः) निर्माणकर्त्ता (दस्माः) दुःखों के विनाशक जन (रुरुचन्त) उत्तम प्रकार शोभित होते हैं (ते) वे निरन्तर (वि, दधुः) विधान करें ॥२॥
Essence
जो यथार्थवक्ता सब के सुख की इच्छा करनेवाले विद्वान् जन हों, वे ही सब के सब सुखों के करने योग्य होवें ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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