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Rigveda Mandal 4 / Sukta 55 / Mantra 1

58 Sukta
10 Mantra
4/55/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
को व॑स्त्रा॒ता व॑सवः॒ को व॑रू॒ता द्यावा॑भूमी अदिते॒ त्रासी॑थां नः। सही॑यसो वरुण मित्र॒ मर्ता॒त्को वो॑ऽध्व॒रे वरि॑वो धाति देवाः ॥१॥

कः । वः॒ । त्रा॒ता । व॒स॒वः॒ । कः । व॒रू॒ता । द्यावा॑भूमी॒ इति॑ । अ॒दि॒ते॒ । त्रासी॑थाम् । नः॒ । सही॑यसः । व॒रु॒ण॒ । मि॒त्र॒ । मर्ता॑त् । कः । वः॒ । अ॒ध्व॒रे । वरि॑वः । धा॒ति॒ । दे॒वाः॒ ॥

Mantra without Swara
को वस्त्राता वसवः को वरूता द्यावाभूमी अदिते त्रासीथां नः। सहीयसो वरुण मित्र मर्तात्को वोऽध्वरे वरिवो धाति देवाः ॥

कः। वः। त्राता। वसवः। कः। वरूता। द्यावाभूमी इति। अदिते। त्रासीथाम्। नः। सहीयसः। वरुण। मित्र। मर्तात्। कः। वः। अध्वरे। वरिवः। धाति। देवाः ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 6 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वरुण) उत्तम विद्वन् अध्यापक (मित्र) सम्पूर्ण मित्रों के उपदेशक (सहीयसः) अत्यन्त सहनेवाले बलिष्ठ ! (नः) हम लोगों के और (वः) आप लोगों के (अध्वरे) सत्य व्यवहार में (कः) कौन (मर्त्तात्) मनुष्य से (वरिवः) सेवन को (धाति) धारण करता है (द्यावाभूमी) प्रकाश और पृथिवी के सदृश आप दोनों हम लोगों की (त्रासीथाम्) रक्षा करो हे (वसवः) रहनेवाले (देवाः) विद्वानो ! (वः) आप लोगों का (कः) कौन (त्राता) रक्षक है। हे (अदिते) नहीं नाश होनेवाले जगदीश्वर ! आप का (कः) कौन (वरूता) स्वीकार करनेवाला है ॥१॥
Essence
जो परमेश्वर की आज्ञा का पालन करता है, वह परमेश्वर से स्वीकार किया जाता है। हे मनुष्यो ! जो हमारा और आप लोगों का रक्षक है, वही हम लोगों से सेवा करने योग्य है और जो अहिंसा से सब मनुष्यों को विज्ञान में धारण करते हैं, वह और वे सदा सत्कार करने योग्य हैं ॥१॥
Subject
अब दश ऋचावाले पचपनवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् के गुणों का वर्णन करते हैं ॥