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Rigveda Mandal 4 / Sukta 54 / Mantra 3

58 Sukta
6 Mantra
4/54/3
Devata- सविता Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अचि॑त्ती॒ यच्च॑कृ॒मा दैव्ये॒ जने॑ दी॒नैर्दक्षैः॒ प्रभू॑ती पूरुष॒त्वता॑। दे॒वेषु॑ च सवित॒र्मानु॑षेषु च॒ त्वं नो॒ अत्र॑ सुवता॒दना॑गसः ॥३॥

अचि॑त्ती । यत् । च॒कृ॒म । दैव्ये॑ । जने॑ । दी॒नैः । दक्षः॑ । प्रऽभू॑ती । पु॒रु॒ष॒त्वता॑ । दे॒वेषु॑ । च॒ । स॒वि॒तः॒ । मानु॑षेषु । च॒ । त्वम् । नः॒ । अत्र॑ । सु॒व॒ता॒त् । अना॑गसः ॥

Mantra without Swara
अचित्ती यच्चकृमा दैव्ये जने दीनैर्दक्षैः प्रभूती पूरुषत्वता। देवेषु च सवितर्मानुषेषु च त्वं नो अत्र सुवतादनागसः ॥

अचित्ती। यत्। चकृम। दैव्ये। जने। दीनैः। दक्षैः। प्रऽभूती। पुरुषत्वता। देवेषु। च। सवितः। मानुषेषु। च। त्वम्। नः। अत्र। सुवतात्। अनागसः ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 5 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सवितः) सम्पूर्ण जगत् के उत्पन्न करनेवाले ! (अचित्ती) अविद्या से (प्रभूती) बहुत्व से (दीनैः) क्षीण अर्थात् दुर्बल (दक्षैः) चतुरों से और (पूरुषत्वता) उत्तम पुरुषवान् से (दैव्ये) विद्वानों में चतुर (जने) विद्वान् में (देवेषु) विद्वानों (च) और (मानुषेषु) अविद्वानों में (च) भी (यत्) जो कर्म्म (चकृमा) हम लोग करें (अत्र) इस में (नः) हम (अनागसः) अनपराधियों को (त्वम्) आप (सुवतात्) प्रेरणा करो ॥३॥
Essence
हे विद्वानो ! आप लोग जो हम लोग अविद्या से आप लोगों का अपराध करें, वह क्षमा करने योग्य है और हम लोगों को अध्यापन और उपदेश से निरपराधी करो ॥३॥
Subject
अब विद्वानों के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥