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Rigveda Mandal 4 / Sukta 54 / Mantra 1

58 Sukta
6 Mantra
4/54/1
Devata- सविता Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अभू॑द्दे॒वः स॑वि॒ता वन्द्यो॒ नु न॑ इ॒दानी॒मह्न॑ उप॒वाच्यो॒ नृभिः॑। वि यो रत्ना॒ भज॑ति मान॒वेभ्यः॒ श्रेष्ठं॑ नो॒ अत्र॒ द्रवि॑णं॒ यथा॒ दध॑त् ॥१॥

अभू॑त् । दे॒वः । स॒वि॒ता । वन्द्यः॑ । नु । नः॒ । इ॒दानी॑म् । अह्नः॑ । उ॒प॒ऽवाच्यः॑ । नृऽभिः॑ । वि । यः । रत्ना॑ । भज॑ति । मा॒न॒वेभ्यः॑ । श्रेष्ठ॑म् । नः॒ । अत्र॑ । द्रवि॑णम् । यथा॑ । दध॑त् ॥

Mantra without Swara
अभूद्देवः सविता वन्द्यो नु न इदानीमह्न उपवाच्यो नृभिः। वि यो रत्ना भजति मानवेभ्यः श्रेष्ठं नो अत्र द्रविणं यथा दधत् ॥

अभूत्। देवः। सविता। वन्द्यः। नु। नः। इदानीम्। अह्नः। उपऽवाच्यः। नृऽभिः। वि। यः। रत्ना। भजति। मानवेभ्यः। श्रेष्ठम्। नः। अत्र। द्रविणम्। यथा। दधत् ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 5 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (इदानीम्) इस समय (अह्नः) दिन के मध्य में जैसे (नृभिः) नायक अर्थात् मुखिया मनुष्यों से (उपवाच्यः) उपदेश योग्य और (नः) हम लोगों के (वन्द्यः) प्रशंसा करने योग्य (सविता) सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों को और (देवः) सम्पूर्ण सुखों को देनेवाला (अभूत्) होता है जो (नः) हम (मानवेभ्यः) विचारशीलों के लिये (रत्ना) रमण करने योग्य धनों को (यथा) जैसे (वि, भजति) बाँटता और (अत्र) इस संसार में (श्रेष्ठम्) अत्यन्त उत्तम (द्रविणम्) धन वा यश को (नु) शीघ्र (दधत्) धारण करे, वैसे ही हम लोगों को सत्कार करने योग्य है ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। नष्ट उनका भाग्य जो सम्पूर्ण ऐश्वर्य और यश के देनेवाले वन्दना करने योग्य तथा स्तुति, उपासना और उपदेश करने योग्य परमात्मा को छोड़ के अन्य की उपासना करते हैं ॥१॥
Subject
अब छः ऋचावाले चौपनवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में सविता परमात्मा के गुणों का वर्णन करते हैं ॥