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Rigveda Mandal 4 / Sukta 53 / Mantra 7

58 Sukta
7 Mantra
4/53/7
Devata- सविता Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आग॑न्दे॒व ऋ॒तुभि॒र्वर्ध॑तु॒ क्षयं॒ दधा॑तु नः सवि॒ता सु॑प्र॒जामिष॑म्। स नः॑ क्ष॒पाभि॒रह॑भिश्च जिन्वतु प्र॒जाव॑न्तं र॒यिम॒स्मे समि॑न्वतु ॥७॥

आ । अ॒ग॒न् । दे॒वः । ऋ॒तुऽभिः॑ । वर्ध॑तु । क्षय॑म् । दधा॑तु । नः॒ । स॒वि॒ता । सु॒ऽप्र॒जाम् । इष॑म् । सः । नः॒ । क्ष॒पाभिः॑ । अह॑ऽभिः । च॒ । जि॒न्व॒तु॒ । प्र॒जाऽव॑न्तम् । र॒यिम् । अ॒स्मे इति॑ । सम् । इ॒न्व॒तु॒ ॥

Mantra without Swara
आगन्देव ऋतुभिर्वर्धतु क्षयं दधातु नः सविता सुप्रजामिषम्। स नः क्षपाभिरहभिश्च जिन्वतु प्रजावन्तं रयिमस्मे समिन्वतु ॥

आ। अगन्। देवः। ऋतुऽभिः। वर्धतु। क्षयम्। दधातु। नः। सविता। सुऽप्रजाम्। इषम्। सः। नः। क्षपाभिः। अहऽभिः। च। जिन्वतु। प्रजाऽवन्तम्। रयिम्। अस्मे इति। सम्। इन्वतु ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 4 Mantra » 7

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (सविता) सम्पूर्ण जगत् का उत्पन्न करनेवाला (देवः) निरन्तर प्रकाशमान जगदीश्वर (ऋतुभिः) वसन्त आदि ऋतुओं से (नः) हम लोगों के (क्षयम्) निवास की (वर्धतु) वृद्धि करें और हम लोगों को (आ) सब प्रकार से (अगन्) प्राप्त हो (सुप्रजाम्) उत्तम प्रजा और (इषम्) अन्न आदि को (दधातु) धारण करे (सः) वह (क्षपाभिः) रात्रियों और (अहभिः) दिनों के साथ (च) भी (नः) हम लोगों को (जिन्वतु) प्रसन्न और आनन्दित करे और (अस्मे) हम लोगों के लिये (प्रजावन्तम्) बहुत प्रजाओं से युक्त (रयिम्) धन को (सम्, इन्वतु) अच्छे प्रकार देवे ॥७॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो परमात्मा सब दिन, सब रात्रियों में सब जगत् की सब प्रकार से रक्षा करता है, सब पदार्थों को रच के हम लोगों के लिये देकर हम लोगों को निरन्तर आनन्दित करता है, वह हम लोगों को सदा उपासना करने योग्य है ॥७॥ इस सूक्त में सविता अर्थात् सकल जगत् के उत्पन्न करनेवाले परमात्मा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥७॥ यह तिरपनवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥