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Rigveda Mandal 4 / Sukta 53 / Mantra 6

58 Sukta
7 Mantra
4/53/6
Devata- सविता Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
बृ॒हत्सु॑म्नः प्रसवी॒ता नि॒वेश॑नो॒ जग॑तः स्था॒तुरु॒भय॑स्य॒ यो व॒शी। स नो॑ दे॒वः स॑वि॒ता शर्म॑ यच्छत्व॒स्मे क्षया॑य त्रि॒वरू॑थ॒मंह॑सः ॥६॥

बृ॒हत्ऽसु॑म्नः । प्र॒ऽस॒वि॒ता । नि॒ऽवेश॑नः । जग॑तः । स्था॒तुः । उ॒भय॑स्य । यः । व॒शी । सः । नः॒ । दे॒वः । स॒वि॒ता । शर्म॑ । य॒च्छ॒तु॒ । अ॒स्मे इति॑ । क्षया॑य । त्रि॒ऽवरू॑थम् । अंह॑सः ॥

Mantra without Swara
बृहत्सुम्नः प्रसवीता निवेशनो जगतः स्थातुरुभयस्य यो वशी। स नो देवः सविता शर्म यच्छत्वस्मे क्षयाय त्रिवरूथमंहसः ॥

बृहत्ऽसुम्नः। प्रऽसविता। निऽवेशनः। जगतः। स्थातुः। उभयस्य। यः। वशी। सः। नः। देवः। सविता। शर्म। यच्छतु। अस्मे इति। क्षयाय। त्रिऽवरूथम्। अंहसः ॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 4 Mantra » 6

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (नः) हम लोगों के लिये (बृहत्सुम्नः) अत्यन्त सुख का (प्रसवीता) उत्पन्न करनेवाला और (जगतः) जङ्गम अर्थात् चेतनता युक्त मनुष्य आदि और (स्थातुः) स्थिर स्थावर अर्थात् नहीं चलने-फिरनेवाले वृक्ष आदि जगत् के (निवेशनः) निवेश अर्थात् स्थिति का करनेवाला (उभयस्य) दो प्रकार के जगत् के (वशी) वश करने को समर्थ (देवः) दाता जगदीश्वर हम लोगों के लिये विद्या को (यच्छतु) देवे (सः) वह (सविता) सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य से युक्त (अस्मे) हम लोगों के (क्षयाय) निवास के लिये (अंहसः) दुःख से अलग हुए (त्रिवरूथम्) तीन गृह जिसमें उस (शर्म) उत्तम प्रकार सुख देनेवाले स्थान को देवे, वही हम लोगों का उपासना करने योग्य देव हो ॥६॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर सब जगत् का नियामक और सब जीवों के निवास के लिये अनेक प्रकार के स्थान का रचनेवाला है, उसको छोड़ के अन्य किसी की भी उपासना न करो ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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