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Rigveda Mandal 4 / Sukta 53 / Mantra 4

58 Sukta
7 Mantra
4/53/4
Devata- सविता Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अदा॑भ्यो॒ भुव॑नानि प्र॒चाक॑शद्व्र॒तानि॑ दे॒वः स॑वि॒ताभि र॑क्षते। प्रास्रा॑ग्बा॒हू भुव॑नस्य प्र॒जाभ्यो॑ धृ॒तव्र॑तो म॒हो अज्म॑स्य राजति ॥४॥

अदा॑भ्यः । भुव॑नानि । प्र॒ऽचाक॑शत् । व्र॒तानि॑ । दे॒वः । स॒वि॒ता । अ॒भि । र॒क्ष॒ते॒ । प्र । अ॒स्रा॒क् । बा॒हू इति॑ । भुव॑नस्य । प्र॒ऽजाभ्यः॑ । धृ॒तऽव्र॑तः । म॒हः । अज्म॑स्य । रा॒ज॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
अदाभ्यो भुवनानि प्रचाकशद्व्रतानि देवः सविताभि रक्षते। प्रास्राग्बाहू भुवनस्य प्रजाभ्यो धृतव्रतो महो अज्मस्य राजति ॥

अदाभ्यः। भुवनानि। प्रऽचाकशत्। व्रतानि। देवः। सविता। अभि। रक्षते। प्र। अस्राक्। बाहू इति। भुवनस्य। प्रऽजाभ्यः। धृतऽव्रत। महः। अज्मस्य। राजति ॥४॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 4 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (अदाभ्यः) नहीं नष्ट होने योग्य अर्थात् नहीं मन से छोड़ने योग्य (सविता) सूर्य्य (धृतव्रतः) व्रतों को धारण करनेवाला (देवः) सुन्दर (महः) बड़े (अज्मस्य) अन्तरिक्ष में छोड़े हुए (भुवनस्य) लोक (प्रजाभ्यः) प्रजाओं के लिये (व्रतानि) सत्यभाषण आदि व्रतों को और (भुवनानि) लोकोत्पन्न समस्त वस्तुओं को (प्रचाकशत्) प्रकाश करता (बाहू) बल और वीर्य्य को (प्र, अस्राक्) उत्पन्न करता सब की (अभि) प्रत्यक्ष (रक्षते) रक्षा करता और (राजति) प्रकाश करता है, वही सब लोगों को उपासना करने योग्य है ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस परमेश्वर ने प्रजाओं में सम्पूर्ण हित सिद्ध किया और जो भीतर-बाहर अभिव्याप्त होके सब के लिये कर्म्मों का फल देता है, वही निरन्तर ध्यान करने योग्य है ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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