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Rigveda Mandal 4 / Sukta 53 / Mantra 3

58 Sukta
7 Mantra
4/53/3
Devata- सविता Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आप्रा॒ रजां॑सि दि॒व्यानि॒ पार्थि॑वा॒ श्लोकं॑ दे॒वः कृ॑णुते॒ स्वाय॒ धर्म॑णे। प्र बा॒हू अ॑स्राक्सवि॒ता सवी॑मनि निवे॒शय॑न्प्रसु॒वन्न॒क्तुभि॒र्जग॑त् ॥३॥

आ । अ॒प्राः॒ । रजां॑सि । दि॒व्यानि॑ । पार्थि॑वा । श्लोक॑म् । दे॒वः । कृ॒णु॒ते॒ । स्वाय॑ । धर्म॑णे । प्र । बा॒हू इति॑ । अ॒स्रा॒क् । स॒वि॒ता । सवी॑मनि । नि॒ऽवे॒शय॑न् । प्र॒ऽसु॒वन् । अ॒क्तुऽभिः॑ । जग॑त् ॥

Mantra without Swara
आप्रा रजांसि दिव्यानि पार्थिवा श्लोकं देवः कृणुते स्वाय धर्मणे। प्र बाहू अस्राक्सविता सवीमनि निवेशयन्प्रसुवन्नक्तुभिर्जगत् ॥

आ। अप्राः। रजांसि। दिव्यानि। पार्थिवा। श्लोकम्। देवः। कृणुते। स्वाय। धर्मणे। प्र। बाहू इति। अस्राक्। सविता। सवीमनि। निऽवेशयन्। प्रऽसुवन्। अक्तुऽभिः। जगत् ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 4 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (सविता) सम्पूर्ण जगत् का उत्पन्न करनेवाला (देवः) प्रकाशमान विद्वान् (सवीमनि) बड़े ऐश्वर्य्य में (अक्तुभिः) रात्रियों के साथ (जगत्) सम्पूर्ण संसार को (निवेशयन्) प्रवेश कराता और (प्रसुवन्) उत्पन्न करता हुआ (बाहू) भुजाओं को (अस्राक्) उत्पन्न करता वह विद्वान् (स्वाय) अपनी (धर्म्मणे) धर्म्म की उन्नति के लिये (श्लोकम्) श्लाघा प्रशंसा करने योग्य वाणी को (प्र, कृणुते) उत्पन्न करता, परमात्मा और (दिव्यानि) शुद्ध (पार्थिवा) पृथिवी में विदित (रजांसि) लोकों को (आ, अप्राः) व्याप्त होता है ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर सम्पूर्ण जगत् में अभिव्याप्त हो और उस जगत् को रच के धर्म्म और वेदवाणी का प्रचार करके संसार को व्यवस्थित अर्थात् जैसा चाहिये वैसा नियत करता, उसीको सब का स्वामी जानके निरन्तर उपासना करो ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥