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Rigveda Mandal 4 / Sukta 53 / Mantra 2

58 Sukta
7 Mantra
4/53/2
Devata- सविता Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
दि॒वो ध॒र्ता भुव॑नस्य प्र॒जाप॑तिः पि॒शङ्गं॑ द्रा॒पिं प्रति॑ मुञ्चते क॒विः। वि॒च॒क्ष॒णः प्र॒थय॑न्नापृ॒णन्नु॒र्वजी॑जनत्सवि॒ता सु॒म्नमु॒क्थ्य॑म् ॥२॥

दि॒वः । ध॒र्ता । भुव॑नस्य । प्र॒जाऽप॑तिः । पि॒शङ्ग॑म् । द्रा॒पिम् । प्रति॑ । मु॒ञ्च॒ते॒ । क॒विः । वि॒ऽच॒क्ष॒णः । प्र॒थय॑न् । आ॒ऽपृ॒णन् । उ॒रु । अजी॑जनत् । स॒वि॒ता । सु॒म्नम् । उ॒क्थ्य॑म् ॥

Mantra without Swara
दिवो धर्ता भुवनस्य प्रजापतिः पिशङ्गं द्रापिं प्रति मुञ्चते कविः। विचक्षणः प्रथयन्नापृणन्नुर्वजीजनत्सविता सुम्नमुक्थ्यम् ॥

दिवः। धर्ता। भुवनस्य। प्रजाऽपतिः। पिशङ्गम्। द्रापिम्। प्रति। मुञ्चते। कविः। विऽचक्षणः। प्रथयन्। आऽपृणन्। उरु। अजीजनत्। सविता। सुम्नम्। उक्थ्यम् ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 4 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! जो यह (दिवः) प्रकाश और (भुवनस्य) अनेक भूगोलों से अलङ्कृत अर्थात् शोभित संसार का (धर्त्ता) धारण करनेवाला (प्रजापतिः) प्रजा का पालनकर्त्ता (कविः) तेजयुक्त दर्शनवाला (पिशङ्गम्) विचित्र रूपवाले (द्रापिम्) कवच को (प्रति, मुञ्चते) त्याग करता है और (विचक्षणः) अनेक प्रकार से पदार्थों का प्रकाश करनेवाला (प्रथयन्) विस्तार करता और (आपृणन्) सब प्रकार से पूर्ण करता हुआ (सविता) सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों से युक्त करनेवाला वा समर्थ ऐश्वर्य्यों के देने का निमित्त (उरु) बहुत (उक्थ्यम्) प्रशंसा करने योग्य (सुम्नम्) सुख को (अजीजनत्) उत्पन्न करता है, वह आप लोगों को यथावत् जानने योग्य है ॥२॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस परमेश्वर ने प्रजा के धारण प्रकाश और पालन के लिये सूर्य्य बनाया, उसी परमेश्वर की उपासना करके बहुत सुख को प्राप्त होइये ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥