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Rigveda Mandal 4 / Sukta 52 / Mantra 6

58 Sukta
7 Mantra
4/52/6
Devata- उषाः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ॒प॒प्रुषी॑ विभावरि॒ व्या॑व॒र्ज्योति॑षा॒ तमः॑। उषो॒ अनु॑ स्व॒धाम॑व ॥६॥

आ॒प॒प्रुषी॑ । वि॒भा॒ऽव॒रि॒ । वि । आ॒वः॒ । ज्योति॑षा । तमः॑ । उषः॑ । अनु॑ । स्व॒धाम् । अ॒व॒ ॥

Mantra without Swara
आपप्रुषी विभावरि व्यावर्ज्योतिषा तमः। उषो अनु स्वधामव ॥

आऽपप्रुषी। विभाऽवरि। वि आवः। ज्योतिषा। तमः। उषः। अनु। स्वधाम्। अव ॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 3 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (उषः) प्रभात वेला के सदृश उत्तम प्रकाश और (विभावरि) प्रशंसित विविध प्रकाश से युक्त उत्तम गुणवाली स्त्री ! (आपप्रुषी) सब ओर से सर्व विद्याओं को व्याप्त तू (ज्योतिषा) प्रकाश से (तमः) अन्धकार के सदृश दोषों की (वि, आवः) विगतरक्षा अर्थात् रखने के विरुद्ध निकाल और (अनु, स्वधाम्) अनुकूल अन्न आदि की (अव) रक्षा कर ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रभात वेला अपने प्रकाश से अन्धकार का निवारण करती है, वैसे ही विद्यायुक्त स्त्रियाँ अपने उत्तम स्वभाव से दोषों का निवारण करके उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्न आदि से सब की उत्तम प्रकार रक्षा करें ॥६॥
Subject
अब उषा के तुल्य स्त्रियों के कर्त्तव्य कामों को कहते हैं ॥