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Rigveda Mandal 4 / Sukta 51 / Mantra 7

58 Sukta
11 Mantra
4/51/7
Devata- उषाः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ता घा॒ ता भ॒द्रा उ॒षसः॑ पु॒रासु॑रभि॒ष्टिद्यु॑म्ना ऋ॒तजा॑तसत्याः। यास्वी॑जा॒नः श॑शमा॒न उ॒क्थैः स्तु॒वञ्छंस॒न्द्रवि॑णं स॒द्य आप॑ ॥७॥

ताः । घ॒ । ताः । भ॒द्राः । उ॒षसः॑ । पु॒रा । आ॒सुः॒ । अ॒भि॒ष्टिऽद्यु॑म्नाः । ऋ॒तजा॑तऽसत्याः । यासु॑ । ई॒जा॒नः । श॒श॒मा॒नः । उ॒क्थैः । स्तु॒वन् । शंस॑न् । द्रवि॑णम् । स॒द्यः । आप॑ ॥

Mantra without Swara
ता घा ता भद्रा उषसः पुरासुरभिष्टिद्युम्ना ऋतजातसत्याः। यास्वीजानः शशमान उक्थैः स्तुवञ्छंसन्द्रविणं सद्य आप ॥

ताः। घ। ताः। भद्राः। उषसः। पुरा। आसुः। अभिष्टिऽद्युम्नाः। ऋतजातऽसत्याः। यासु। ईजानः। शशमानः। उक्थैः। स्तुवन्। शंसन्। द्रविणम्। सद्यः। आप ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 2 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (ईजानः) गमन करनेवाला जन (शशमानः) प्रशंसा को प्राप्त होता (उक्थैः) कहने योग्य वचनों से (स्तुवन्) स्तुति करता और (शंसन्) प्रशंसा करता हुआ (यासु) जिनमें (द्रविणम्) धन वा यश को (सद्यः) शीघ्र (आप) प्राप्त होता है (ताः) वे (उषसः) प्रभात वेला (भद्राः) कल्याण करनेवाली जैसी (पुरा) पहिले (आसुः) हुईं वैसी फिर वर्त्तमान हैं, उनके समान जो (अभिष्टिद्युम्ना) प्रशंसित यशरूप धन से युक्त (ऋतजातसत्याः) सत्य से उत्पन्न हुए व्यवहारों में श्रेष्ठ ब्रह्मचारिणी हैं (ताः, घा) उन्हीं को आप लोग गृहाश्रम के लिये प्राप्त होओ ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य के साथ प्रातर्वेला सदा वर्त्तमान है, वैसे ही स्वयंवर जिन्होंने किया, ऐसे स्त्री-पुरुष यशस्वी और सत्य आचरणवाले होवें ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥