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Rigveda Mandal 4 / Sukta 51 / Mantra 5

58 Sukta
11 Mantra
4/51/5
Devata- उषाः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यू॒यं हि दे॑वीर्ऋत॒युग्भि॒रश्वैः॑ परिप्रया॒थ भुव॑नानि स॒द्यः। प्र॒बो॒धय॑न्तीरुषसः स॒सन्तं॑ द्वि॒पाच्चतु॑ष्पाच्च॒रथा॑य जी॒वम् ॥५॥

यू॒यम् । हि । दे॒वीः॒ । ऋ॒त॒युक्ऽभिः॑ । अश्वैः॑ । प॒रि॒ऽप्र॒या॒थ । भुव॑नानि । स॒द्यः । प्र॒ऽबो॒धय॑न्तीः । उ॒ष॒सः॒ । स॒सन्त॑म् । द्वि॒ऽपात् । चतुः॑ऽपात् । च॒रथा॑य । जी॒वम् ॥

Mantra without Swara
यूयं हि देवीर्ऋतयुग्भिरश्वैः परिप्रयाथ भुवनानि सद्यः। प्रबोधयन्तीरुषसः ससन्तं द्विपाच्चतुष्पाच्चरथाय जीवम् ॥

यूयम्। हि। देवीः। ऋतयुक्ऽभिः। अश्वैः। परिऽप्रयाथ। भुवनानि। सद्यः। प्रऽबोधयन्तीः। उषसः। ससन्तम्। द्विऽपात्। चतुःपात्। चरथाय। जीवम् ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 1 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यूयम्) आप लोग जैसे (चरथाय) भ्रमण के लिये (ससन्तम्) शयन करते हुए (जीवम्) प्राणधारी को (प्रबोधयन्तीः) जगाती हुई (उषसः) प्रातर्वेला (द्विपात्) दो पादवाले मनुष्य आदि और (चतुष्पात्) चार पैरवाली गौ आदि के सदृश (सद्यः) शीघ्र (भुवनानि) लोक-लोकान्तरों को प्राप्त होती हैं, वैसे (हि) ही (ऋतयुग्भिः) सत्य से युक्त (अश्वैः) बड़े बलिष्ठ और पुरुषार्थियों के साथ (देवीः) दिव्य गुण, कर्म, स्वभाव युक्त स्त्रियों को (परिप्रयाथ) सब ओर से प्राप्त होओ ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो जन उत्तम गुणों से युक्त, विदुषी, सुन्दर, अपने सदृश स्त्रियों को प्राप्त होते हैं वे सदा ही प्रातःकाल के सदृश प्रकाशमान और सब के बोधक होते हैं ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥