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Rigveda Mandal 4 / Sukta 51 / Mantra 11

58 Sukta
11 Mantra
4/51/11
Devata- उषाः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तद्वो॑ दिवो दुहितरो विभा॒तीरुप॑ ब्रुव उषसो य॒ज्ञके॑तुः। व॒यं स्या॑म य॒शसो॒ जने॑षु॒ तद्द्यौश्च॑ ध॒त्तां पृ॑थि॒वी च॑ दे॒वी ॥११॥

तत् । वः॒ । दि॒वः॒ । दु॒हि॒त॒रः॒ । वि॒ऽभा॒तीः । उप॑ । ब्रु॒वे॒ । उ॒ष॒सः॒ । य॒ज्ञऽके॑तुः । व॒यम् । स्या॒म॒ । य॒शसः॑ । जने॑षु । तत् । द्यौः । च॒ । ध॒त्ताम् । पृ॒थि॒वी । च॒ । दे॒वी ॥

Mantra without Swara
तद्वो दिवो दुहितरो विभातीरुप ब्रुव उषसो यज्ञकेतुः। वयं स्याम यशसो जनेषु तद्द्यौश्च धत्तां पृथिवी च देवी ॥

तत्। वः। दिवः। दुहितरः। विऽभातीः। उप। ब्रुवे। उषसः। यज्ञऽकेतुः। वयम्। स्याम। यशसः। जनेषु। तत्। द्यौः। च। धत्ताम्। पृथिवी। च। देवी ॥११॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 2 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (विभातीः) प्रकाश करती हुईं (दिवः) प्रकाश की (दुहितरः) कन्याओं के सदृश वर्त्तमान (उषसः) प्रातर्वेला के सदृश स्त्रियाँ (वः) आप लोगों का जो विषय कहें (तत्) उसको (यज्ञकेतुः) यज्ञ का जनानेवाला मैं आप लोगों को (उप, ब्रुवे) उपदेश देता हूँ जैसे (तत्) उसको (देवी) प्रकाश (द्यौः) बिजुली (च) और (पृथिवी) पृथिवी (च) भी (धत्ताम्) धारण करें, वैसे (वयम्) हम लोग (जनेषु) विद्वानों में (यशसः) यशस्वी (स्याम) होवें ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो परस्पर जनों को उपदेश देकर सत्य का ग्रहण कराते हैं, वे सूर्य्य के सदृश प्रकाश करने और भूमि के सदृश प्रजा के धारण करनेवाले होते हैं ॥११॥ इस सूक्त में प्रातःकाल स्त्री और पुरुष के गुण कर्म वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥११॥ यह इक्क्यावनवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब पुरुष विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥