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Rigveda Mandal 4 / Sukta 50 / Mantra 9

58 Sukta
11 Mantra
4/50/9
Devata- बृहस्पतिः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अप्र॑तीतो जयति॒ सं धना॑नि॒ प्रति॑जन्यान्यु॒त या सज॑न्या। अ॒व॒स्यवे॒ यो वरि॑वः कृ॒णोति॑ ब्र॒ह्मणे॒ राजा॒ तम॑वन्ति दे॒वाः ॥९॥

अप्र॑तिऽइतः । ज॒य॒ति॒ । सम् । धना॑नि । प्रति॑ऽजन्यानि । उ॒त । या । सऽज॑न्या । अ॒व॒स्यवे॑ । यः । वरि॑वः । कृ॒णोति॑ । ब्र॒ह्मणे॑ । राजा॑ । तम् । अ॒व॒न्ति॒ । दे॒वाः ॥

Mantra without Swara
अप्रतीतो जयति सं धनानि प्रतिजन्यान्युत या सजन्या। अवस्यवे यो वरिवः कृणोति ब्रह्मणे राजा तमवन्ति देवाः ॥

अप्रतिऽइतः। जयति। सम्। धनानि। प्रतिऽजन्यानि। उत। या। सऽजन्या। अवस्यवे। यः। वरिवः। कृणोति। ब्रह्मणे। राजा। तम्। अवन्ति। देवाः ॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 27 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (अप्रतीतः) शत्रुओं से नहीं पराजित किया गया (राजा) राजा (अवस्यवे) रक्षा की इच्छा करते हुए (ब्रह्मणे) परमात्मा के लिये (वरिवः) सेवन को (कृणोति) करता है (तम्) उसकी (देवाः) विद्वान् जन (अवन्ति) रक्षा करते हैं और (या) जो (सजन्या) तुल्य उत्पन्न हुए पदार्थों के साथ वर्त्तमान (उत) भी (प्रतिजन्यानि) मनुष्य-मनुष्य के प्रति वर्त्तमान (धनानि) धन हैं उनको सहज स्वभाव से (सम्, जयति) अच्छे प्रकार जीतता है ॥९॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो राजा परमात्मा ही की उपासना करता और यथार्थवक्ता विद्वानों की सेवा करता है, वही नहीं नाश होनेवाले राज्य और धन को प्राप्त होकर सदा ही विजयी होता है ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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