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Rigveda Mandal 4 / Sukta 50 / Mantra 7

58 Sukta
11 Mantra
4/50/7
Devata- बृहस्पतिः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स इद्राजा॒ प्रति॑जन्यानि॒ विश्वा॒ शुष्मे॑ण तस्थाव॒भि वी॒र्ये॑ण। बृह॒स्पतिं॒ यः सुभृ॑तं बि॒भर्ति॑ वल्गू॒यति॒ वन्द॑ते पूर्व॒भाज॑म् ॥७॥

सः । इत् । राजा॑ । प्रति॑ऽजन्यानि । विश्वा॑ । शुष्मे॑ण । त॒स्थौ॒ । अ॒भि । वी॒र्ये॑ण । बृह॒स्पति॑म् । यः । सुऽभृ॑तम् । बि॒भर्ति॑ । व॒ल्गु॒ऽयति॑ । वन्द॑ते । पू॒र्व॒ऽभाज॑म् ॥

Mantra without Swara
स इद्राजा प्रतिजन्यानि विश्वा शुष्मेण तस्थावभि वीर्येण। बृहस्पतिं यः सुभृतं बिभर्ति वल्गूयति वन्दते पूर्वभाजम् ॥

सः। इत्। राजा। प्रतिऽजन्यानि। विश्वा। शुष्मेण। तस्थौ। अभि। वीर्येण। बृहस्पतिम्। यः। सुऽभृतम्। बिभर्त्ति। वल्गुऽयति। वन्दते। पूर्वऽभाजम् ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 27 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (सुभृतम्) उत्तम प्रकार धारण किये गये (बृहस्पतिम्) बड़ों में बड़े (पूर्वभाजम्) प्राचीनों से सेवा करने योग्य का (बिभर्त्ति) धारण करता (वल्गूयति) सत्कार करता और (वन्दते) कामना करता है जो (शुष्मेण) बल (वीर्य्येण) और पराक्रम से (विश्वा) सम्पूर्ण (प्रतिजन्यानि) प्रत्यक्ष से उत्पन्न होने योग्यों के (अभि) सम्मुख (तस्थौ) स्थित होता है (सः, इत्) वही जगदीश्वर (राजा) सब का प्रकाश करनेवाला सब लोगों के सेवा करने योग्य है ॥७॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो परमेश्वर सम्पूर्ण जगत् को अभिव्याप्त होकर और धारके सूर्य्य को भी धारता है और सम्पूर्ण वेदों का उपदेश देकर प्रशंसित वर्त्तमान है और जिसकी सेवा योगिराज करते हैं, उसी की नित्य उपासना करो ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥