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Rigveda Mandal 4 / Sukta 50 / Mantra 6

58 Sukta
11 Mantra
4/50/6
Devata- बृहस्पतिः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒वा पि॒त्रे वि॒श्वदे॑वाय॒ वृष्णे॑ य॒ज्ञैर्वि॑धेम॒ नम॑सा ह॒विर्भिः॑। बृह॑स्पते सुप्र॒जा वी॒रव॑न्तो व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम् ॥६॥

ए॒व । पि॒त्रे । वि॒श्वऽदे॑वाय । वृष्णे॑ । य॒ज्ञैः । वि॒धे॒म॒ । नम॑सा । ह॒विःऽभिः॑ । बृह॑स्पते । सु॒ऽप्र॒जाः । वी॒रऽव॑न्तः । व॒यम् । स्या॒म॒ । पत॑यः । र॒यी॒णाम् ॥

Mantra without Swara
एवा पित्रे विश्वदेवाय वृष्णे यज्ञैर्विधेम नमसा हविर्भिः। बृहस्पते सुप्रजा वीरवन्तो वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥

एव। पित्रे। विश्वऽदेवाय। वृष्णे। यज्ञैः। विधेम। नमसा। हविऽभिः। बृहस्पते। सुऽप्रजाः। वीरऽवन्तः। वयम्। स्याम। पतयः। रयीणाम् ॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 27 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (बृहस्पते) बड़ों के पालन करनेवाले जैसे हम लोग (यज्ञैः) मिले हुए कर्मों से (विश्वदेवाय) संसार के प्रकाशक (वृष्णे) वृष्टि करने और (पित्रे) पालन करनेवाले के लिये (नमसा) सत्कार वा अन्न आदि से (हविर्भिः) ग्रहण करने योग्य उपदेश वा द्रव्यों से (विधेम) करें और अर्थात् क्रिया विधान करें तथा (सुप्रजाः) विद्या और विनयवाली श्रेष्ठ प्रजाओं से युक्त (वीरवन्तः) वीर पुत्रोंवाले (वयम्) हम लोग (रयीणाम्) धनों के (पतयः) स्वामी (स्याम) होवें (एवा) वैसे ही आप हूजिये ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य्य मेघ के अलङ्कार से सब का पालन करनेवाला है, वैसे ही हम लोग वर्त्ताव करके अति उत्तम पुरुष और राज्य के स्वामी होवें ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥