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Rigveda Mandal 4 / Sukta 50 / Mantra 5

58 Sukta
11 Mantra
4/50/5
Devata- बृहस्पतिः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स सु॒ष्टुभा॒ स ऋक्व॑ता ग॒णेन॑ व॒लं रु॑रोज फलि॒गं रवे॑ण। बृह॒स्पति॑रु॒स्रिया॑ हव्य॒सूदः॒ कनि॑क्रद॒द्वाव॑शती॒रुदा॑जत् ॥५॥

सः । सु॒ऽस्तुभा । सः । ऋक्व॑ता । ग॒णेन॑ । व॒लम् । रु॒रो॒ज॒ । फ॒लि॒ऽगम् । रवे॑ण । बृह॒स्पतिः॑ । उ॒स्रियाः॑ । ह॒व्य॒ऽसूदः॑ । कनि॑क्रदत् । वाव॑शतीः । उत् । आ॒ज॒त् ॥

Mantra without Swara
स सुष्टुभा स ऋक्वता गणेन वलं रुरोज फलिगं रवेण। बृहस्पतिरुस्रिया हव्यसूदः कनिक्रदद्वावशतीरुदाजत् ॥

सः। सुऽस्तुभा। सः। ऋक्वता। गणेन। वलम्। रुरोज। फलिऽगम्। रवेण। बृहस्पतिः। उस्रियाः। हव्यऽसूदः। कनिक्रदत्। वावशतीः। उत्। आजत् ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 26 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! जैसे (सः) वह (हव्यसूदः) हवन करने योग्य पदार्थों को क्षरण कराने अर्थात् अपने प्रताप से अणुरूप करानेवाला (कनिक्रदत्) अत्यन्त शब्द करता हुआ (बृहस्पतिः) बड़ा और सब का पालन करनेवाला सूर्य्य (सुष्टुभा) सुन्दर प्रशंसित (गणेन) किरणसमूह से (फलिगम्) मेघ को (रुरोज) भङ्ग करे और (सः) वह विद्वान् (ऋक्वता) बहुत प्रशंसायुक्त उपदेश देने योग्य विद्यार्थियों के समूह से (रवेण) शब्द से (वलम्) कुटिल चाल को भङ्ग करे और (उस्रियाः) पृथिवी के बीच वर्त्तमान (वावशतीः) अत्यन्त कामना करती हुई प्रजाओं को (उत्, आजत्) प्राप्त होता है, वैसे आप वर्त्ताव करो ॥५॥
Essence
जैसे सूर्य्य वृष्टि के द्वारा सब प्रजाओं की रक्षा करता और बिजुली के शब्द से सब को जनाता है, वैसे ही सब विद्वान् जन विद्या के द्वारा सब के द्वारा सब के आत्माओं को प्रकाशित करें ॥५॥
Subject
अब विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥