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Rigveda Mandal 4 / Sukta 50 / Mantra 3

58 Sukta
11 Mantra
4/50/3
Devata- बृहस्पतिः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
बृह॑स्पते॒ या प॑र॒मा प॑रा॒वदत॒ आ त॑ ऋत॒स्पृशो॒ नि षे॑दुः। तुभ्यं॑ खा॒ता अ॑व॒ता अद्रि॑दुग्धा॒ मध्वः॑ श्चोतन्त्य॒भितो॑ विर॒प्शम् ॥३॥

बृह॑स्पते । या । प॒र॒मा । प॒रा॒ऽवत् । अतः॑ । आ । ते॒ । ऋ॒त॒ऽस्पृशः॑ । नि । से॒दुः॒ । तुभ्य॑म् । खा॒ताः । अ॒व॒ताः । अद्रि॑ऽदुग्धाः । मध्वः॑ । श्चो॒त॒न्ति॒ । अ॒भितः॑ । वि॒ऽर॒प्शम् ॥

Mantra without Swara
बृहस्पते या परमा परावदत आ त ऋतस्पृशो नि षेदुः। तुभ्यं खाता अवता अद्रिदुग्धा मध्वः श्चोतन्त्यभितो विरप्शम् ॥

बृहस्पते। या। परमा। पराऽवत्। अतः। आ। ते। ऋतऽस्पृशः। नि। सेदुः। तुभ्यम्। खाताः। अवताः। अद्रिऽदुग्धाः। मध्वः। श्चोतन्ति। अभितः। विऽरप्शम् ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 26 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (बृहस्पते) बड़े राज्य के पालन करने (ते) आपकी (या) जो (परमा) उत्तम नीति है उससे (ऋतस्पृशः) सत्य का स्पर्श करनेवाले आपके (अद्रिदुग्धाः) मेघ से पूर्ण (खाताः) खोदे गये (मध्वः) मधुर आदि गुणवाले जल से युक्त (अवताः) कूप (तुभ्यम्) आपके लिये (अभितः) सब प्रकार से (श्चोतन्ति) सींचते हैं और (विरप्शम्) महान् संसार को (आ, निषेदुः) सब ओर से स्थित करें (अतः) इससे उनका हम लोग (परावत्) गुणयुक्त सत्कार करें ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! आप लोग वृद्ध विद्वान् राजा लोगों के समीप से अनादि काल से सिद्ध नीति को ग्रहण करके मेघों के सदृश प्रजाओं को सुख से सींचो ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥