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Rigveda Mandal 4 / Sukta 5 / Mantra 9

58 Sukta
15 Mantra
4/5/9
Devata- वैश्वानरः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒दमु॒ त्यन्महि॑ म॒हामनी॑कं॒ यदु॒स्रिया॒ सच॑त पू॒र्व्यं गौः। ऋ॒तस्य॑ प॒दे अधि॒ दीद्या॑नं॒ गुहा॑ रघु॒ष्यद्र॑घु॒यद्वि॑वेद ॥९॥

इ॒दम् । ऊँ॒ इति॑ । त्यत् । महि॑ । म॒हाम् । अनी॑कम् । यत् । उ॒स्रिया॑ । सच॑त । पू॒र्व्यम् । गौः । ऋ॒तस्य॑ । प॒दे । अधि॑ । दीद्या॑नम् । गुहा॑ । र॒घु॒ऽस्यत् । र॒घु॒ऽयत् । वि॒वे॒द॒ ॥

Mantra without Swara
इदमु त्यन्महि महामनीकं यदुस्रिया सचत पूर्व्यं गौः। ऋतस्य पदे अधि दीद्यानं गुहा रघुष्यद्रघुयद्विवेद ॥

इदम्। ऊम् इति। त्यत्। महि। महाम्। अनीकम्। यत्। उस्रिया। सचत। पूर्व्यम्। गौः। ऋतस्य। पदे। अधि। दीद्यानम्। गुहा। रघुऽस्यत्। रघुऽयत्। विवेद॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 2 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे जिज्ञासुजनो ! (यत्) जो (महाम्) बड़ों की (अनीकम्) सेना के सदृश (महि) बड़ा वा (ऋतस्य) सत्य के (पदे) स्थान में जो (दीद्यानम्) प्रकाशित होता हुआ विद्यमान है, उसको (गुहा) बुद्धि में (रघुष्यत्) शीघ्र हिलते हुए के समान (पूर्व्यम्) पूर्वजनों से उत्पन्न किये गए के समान (रघुयत्) शीघ्र जानेवाली (विवेद) जानती है (त्यत्, इदम्, उ) उस ही (उस्रिया) दुग्ध आदि की देनेवाली (गौः) गौ के सदृश (अधि) अधिक आप लोग (सचत) प्राप्त हूजिये ॥९॥
Essence
हे श्रोताजनो ! जो बुद्धि की प्रेरणा करने, मन्द और शीघ्र चलनेवाला सत्य परमेश्वर के मध्य में प्रकाशमान बलिष्ठ वाज पक्षी सेना के सदृश पराक्रमवाले बछड़े को सुख देती हुई गौ के सदृश सुख देनेवाला वस्तु है, वही आप लोगों का स्वरूप है ॥९॥
Subject
अब समाधाता के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥