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Rigveda Mandal 4 / Sukta 5 / Mantra 8

58 Sukta
15 Mantra
4/5/8
Devata- वैश्वानरः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र॒वाच्यं॒ वच॑सः॒ किं मे॑ अ॒स्य गुहा॑ हि॒तमुप॑ नि॒णिग्व॑दन्ति। यदु॒स्रिया॑णा॒मप॒ वारि॑व॒ व्रन्पाति॑ प्रि॒यं रु॒पो अग्रं॑ प॒दं वेः ॥८॥

प्र॒ऽवाच्य॑म् । वच॑सः । किम् । मे॒ । अ॒स्य । गुहा॑ । हि॒तम् । उप॑ । नि॒णिक् । व॒द॒न्ति॒ । यत् । उ॒स्रिया॑णाम् । अप॑ । वाःऽइ॑व । व्रन् । पाति॑ । प्रि॒यम् । रु॒पः । अग्र॑म् । प॒दम् । वेः ॥

Mantra without Swara
प्रवाच्यं वचसः किं मे अस्य गुहा हितमुप निणिग्वदन्ति। यदुस्रियाणामप वारिव व्रन्पाति प्रियं रुपो अग्रं पदं वेः ॥

प्रऽवाच्यम्। वचसः। किम्। मे। अस्य। गुहा। हितम्। उप। निणिक्। वदन्ति। यत्। उस्रियाणाम्। अप। वाःऽइव। व्रन्। पाति। प्रियम्। रुपः। अग्रम्। पदम्। वेरिति वेः॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 2 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
जो (मे) मेरे और (अस्य) इस जन के (वचसः) वचन के सम्बन्ध में (गुहा) बुद्धि में (हितम्) स्थित (प्रवाच्यम्) प्रकर्षता से कहने योग्य (निणिक्) अत्यन्त शुद्ध करनेवाले को (किम्) क्या (उप, वदन्ति) समीप में कहते हैं (यत्) जो (उस्रियाणाम्) गौओं के (वारिव) जल के सदृश वा (वेः) पक्षी के (अग्रम्) ऊँचे (पदम्) स्थान के सदृश (रुपः) पृथिवी के (प्रियम्) सुन्दर भाग को (अप, व्रन्) घेरता है, कौन इन दोनों का (पाति) पालन करता है ॥८॥
Essence
हे विद्वानो ! मेरी और इस जन की बुद्धि में वर्त्तमान चेतन क्या और कैसा है? जो पशुओं के पालन करनेवाला जल के सदृश रक्षा करता और सब से प्रिय देख पड़ता है। और जो आकाश में पक्षी के पैर के सदृश गुप्त है, उसके विज्ञान के लिये हम लोगों के प्रति आप लोग क्या कहते हो ॥८॥
Subject
अब प्रच्छक विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥