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Rigveda Mandal 4 / Sukta 5 / Mantra 15

58 Sukta
15 Mantra
4/5/15
Devata- वैश्वानरः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒स्य श्रि॒ये स॑मिधा॒नस्य॒ वृष्णो॒ वसो॒रनी॑कं॒ दम॒ आ रु॑रोच। रुश॒द्वसा॑नः सु॒दृशी॑करूपः क्षि॒तिर्न रा॒या पु॑रु॒वारो॑ अद्यौत् ॥१५॥

अ॒स्य । श्रि॒ये । स॒म्ऽइ॒धा॒नस्य॑ । वृष्णः॑ । वसोः॑ । अनी॑कम् । दमे॑ । आ । रु॒रो॒च॒ । रुश॑त् । वसा॑नः । सु॒दृशी॑कऽरूपः । क्षि॒तिः । न । रा॒या । पु॒रु॒ऽवारः॑ । अ॒द्यौ॒त् ॥

Mantra without Swara
अस्य श्रिये समिधानस्य वृष्णो वसोरनीकं दम आ रुरोच। रुशद्वसानः सुदृशीकरूपः क्षितिर्न राया पुरुवारो अद्यौत् ॥

अस्य। श्रिये। सम्ऽइधानस्य। वृष्णः। वसोः। अनीकम्। दमे। आ। रुरोच। रुशत्। वसानः। सुदृशीकऽरूपः। क्षितिः। न। राया। पुरुऽवारः। अद्यौत्॥१५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 3 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो (रुशत्) सुन्दर रूप को (वसानः) प्राप्त (सुदृशीकरूपः) उत्तम प्रकार देखने योग्य स्वरूप से युक्त (पुरुवारः) सब से स्वीकार करने योग्य स्वरूप से शोभित तथा (राया) धन से (क्षितिः) पृथिवी के (न) समान (अद्यौत्) प्रकाशित होता है, जिस (समिधानस्य) प्रकाशमान (वृष्णः) बलिष्ठ (वसोः) वसानेवाले राजा के (दमे) गृह में (श्रिये) शोभा वा लक्ष्मी के लिये (अनीकम्) सेना (आ) सब प्रकार (रुरोच) सुन्दर है, उस सेना के और (अस्य) इस वर्त्तमान राजा के सम्पूर्ण समाधान और सुख होते हैं ॥१५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अच्छे रूपवान् पृथिवी के सदृश क्षमा आदि गुणवाले और प्रतिष्ठित चक्रवर्त्ती राजाओं की लक्ष्मी से शोभित हुए उत्तम प्रकार शिक्षित बड़ी बलवती बड़ी सेना को बढ़ाते हैं, उनका ही चक्रवर्त्ती राज्य संभावित होता है औरों का नहीं ॥१५॥ इस सूक्त में बुद्धिमान्, राजा, अध्यापक, उपदेशक, प्रश्नकर्ता और समाधानकर्ता के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥१५॥ यह पाँचवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥