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Rigveda Mandal 4 / Sukta 5 / Mantra 10

58 Sukta
15 Mantra
4/5/10
Devata- वैश्वानरः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अध॑ द्युता॒नः पि॒त्रोः सचा॒साम॑नुत॒ गुह्यं॒ चारु॒ पृश्नेः॑। मा॒तुष्प॒दे प॑र॒मे अन्ति॒ षद्गोर्वृष्णः॑ शो॒चिषः॒ प्रय॑तस्य जि॒ह्वा ॥१०॥

अध॑ । द्यु॒ता॒नः । पि॒त्रोः । सचा॑ । आ॒सा । अम॑नुत । गुह्य॑म् । चारु । पृश्नेः॑ । मा॒तुः । प॒दे । प॒र॒मे । अन्ति॑ । सत् । गोः । वृष्णः॑ । शो॒चिषः॑ । प्रऽय॑तस्य । जि॒ह्वा ॥

Mantra without Swara
अध द्युतानः पित्रोः सचासामनुत गुह्यं चारु पृश्नेः। मातुष्पदे परमे अन्ति षद्गोर्वृष्णः शोचिषः प्रयतस्य जिह्वा ॥

अध। द्युतानः। पित्रोः। सचा। आसा। अमनुत। गुह्यम्। चारु। पृश्नेः। मातुः। पदे। परमे। अन्ति। सत्। गोः। वृष्णः। शोचिषः। प्रऽयतस्य। जिह्वा॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 2 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे जिज्ञासुजनो ! (अध) इसके अनन्तर जो (पित्रोः) माता और पिता की उत्तेजना से (द्युतानः) प्रकाशमान (सचा) सत्य (आसा) मुख से (परमे) उत्तम (मातुः) माता के सदृश वर्त्तमान के (पदे) प्राप्त होने योग्य स्थान में (अन्ति) समीप (सत्) वर्त्तमान (गोः) गौ और (वृष्णः) वृष्टि करनेवाले के सदृश (शोचिषः) प्रकाशमान (प्रयतस्य) प्रयत्न करते हए की (जिह्वा) वाणी के सदृश जो (पृश्नेः) अन्तरिक्ष के मध्य में (चारु) सुन्दर (गुह्यम्) गुप्त है, उस जीवस्वरूप को (अमनुत) जानिये ॥१०॥
Essence
जैसे अन्तरिक्ष और पृथिवी के मध्य में वर्त्तमान सूर्य्य उत्तम प्रकार शोभित है और जैसे विद्वान् की वाणी विद्या का प्रकाश करनेवाली है और जैसे अन्तरिक्ष किसी से भी दूर नहीं है, वैसे ही उत्तम अपना आत्मारूप वस्तु और परमात्मा समीप में वर्त्तमान है, ऐसा जानना चाहिये ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥