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Rigveda Mandal 4 / Sukta 5 / Mantra 1

58 Sukta
15 Mantra
4/5/1
Devata- वैश्वानरः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वै॒श्वा॒न॒राय॑ मी॒ळ्हुषे॑ स॒जोषाः॑ क॒था दा॑शेमा॒ग्नये॑ बृ॒हद्भाः। अनू॑नेन बृह॒ता व॒क्षथे॒नोप॑ स्तभायदुप॒मिन्न रोधः॑ ॥१॥

वै॒श्वा॒न॒राय॑ । मी॒ळ्हुषे॑ । स॒ऽजोषाः॑ । क॒था । दा॒शे॒म॒ । अ॒ग्नये॑ । बृ॒हत् । भाः । अनू॑नेन । बृ॒ह॒ता । व॒क्षथे॑न । उप॑ । स्त॒भा॒य॒त् । उ॒प॒ऽमित् । न । रोधः॑ ॥

Mantra without Swara
वैश्वानराय मीळ्हुषे सजोषाः कथा दाशेमाग्नये बृहद्भाः। अनूनेन बृहता वक्षथेनोप स्तभायदुपमिन्न रोधः ॥

वैश्वानराय। मीळ्हुषे। सऽजोषाः। कथा। दाशेम। अग्नये। बृहत्। भाः। अनूनेन। बृहता। वक्षथेन। उप। स्तभायत्। उपऽमित्। न। रोधः॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 1 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! जो आप (बृहत्) बड़े (भाः) शोभित नापनेवाले और (रोधः) रोकने को (उपमित्) अलग करता है उसके (न) समान (अनूनेन) न्यूनता से रहित (बृहता) बड़े (वक्षथेन) क्रोध से राज्य को (उप, स्तभायत्) रोके उस (वैश्वानराय) सब में नायक (मीळ्हुषे) सेचन करनेवाले (अग्नये) अग्नि के सदृश वर्त्तमान विद्वान् राजा के लिये (सजोषाः) तुल्य प्रीति के सेवन करनेवाले हम लोग सुख को (कथा) किस प्रकार से (दाशेम) देवें ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग सूर्य और बिजुली के सदृश उत्तम गुणों के प्रकाश करने और जल के रोकनेवाले पदार्थ के सदृश दुष्टों के रोकनेवाले और अपने सदृश सुख, दुःख, हानि और लाभ को जानते हुए राज्य करते हैं, वे दण्ड और न्याय को चला सकते हैं ॥१॥
Subject
अब तृतीयाष्टक में पाँचवें अध्याय और चतुर्थ मण्डल में पन्द्रह ऋचावाले पञ्चम सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्नि के दृष्टान्त से राजविषय को कहते हैं ॥