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Rigveda Mandal 4 / Sukta 49 / Mantra 6

58 Sukta
6 Mantra
4/49/6
Devata- इन्द्राबृहस्पती Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सोम॑मिन्द्राबृहस्पती॒ पिब॑तं दा॒शुषो॑ गृ॒हे। मा॒दये॑थां॒ तदो॑कसा ॥६॥

सोम॑म् । इ॒न्द्रा॒बृ॒ह॒स्प॒ती॒ इति॑ । पिब॑तम् । दा॒शुषः॑ । गृ॒हे । मा॒दये॑थाम् । तत्ऽओ॑कसा ॥

Mantra without Swara
सोममिन्द्राबृहस्पती पिबतं दाशुषो गृहे। मादयेथां तदोकसा ॥

सोमम्। इन्द्राबृहस्पती इति। पिबतम्। दाशुषः। गृहे। मादयेथाम्। तत्ऽओकसा ॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 25 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (तदोकसा) उस स्थानवाले (इन्द्राबृहस्पती) राजा और मन्त्री जनो ! आप दोनों (दाशुषः) दाता जन के (गृहे) स्थान में (सोमम्) अति उत्तम रस का (पिबतम्) पान करो और हम लोगों को निरन्तर (मादयेथाम्) आनन्द देओ ॥६॥
Essence
राजा आदि जन जैसे स्वयं विद्यायुक्त, धार्मिक, न्यायकारी और आनन्दित होवें, वैसे प्रजाजनों को भी करें ॥६॥ इस सूक्त में राजा और प्रजादि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥६॥ यह उनचासवाँ सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥