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Rigveda Mandal 4 / Sukta 49 / Mantra 5

58 Sukta
6 Mantra
4/49/5
Devata- इन्द्राबृहस्पती Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इन्द्रा॒बृह॒स्पती॑ व॒यं सु॒ते गी॒र्भिर्ह॑वामहे। अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑ ॥५॥

इन्द्रा॒बृह॒स्पती॒ इति॑ । व॒यम् । सु॒ते । गीः॒ऽभिः । ह॒वा॒म॒हे॒ । अ॒स्य । सोम॑स्य । पी॒तये॑ ॥

Mantra without Swara
इन्द्राबृहस्पती वयं सुते गीर्भिर्हवामहे। अस्य सोमस्य पीतये ॥

इन्द्राबृहस्पती इति। वयम्। सुते। गीःऽभिः। हवामहे। अस्य। सोमस्य। पीतये ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 25 Mantra » 5

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Meaning
हे (इन्द्राबृहस्पती) अध्यापक और उपदेशकजनो ! जैसे (वयम्) हम लोग (गीर्भिः) वाणियों से (अस्य) इस (सोमस्य) ओषधियों से उत्पन्न हुए रस के (पीतये) पान के लिये आप दोनों का (हवामहे) स्वीकार करते हैं, वैसे (सुते) रस के उत्पन्न होने पर हम लोगों का स्वीकार करो ॥५॥
Essence
राजा और प्रजाजनों को चाहिये कि परस्पर के सत्कार से बड़े ऐश्वर्य्य का भोग करें ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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