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Rigveda Mandal 4 / Sukta 49 / Mantra 2

58 Sukta
6 Mantra
4/49/2
Devata- इन्द्राबृहस्पती Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒यं वां॒ परि॑ षिच्यते॒ सोम॑ इन्द्राबृहस्पती। चारु॒र्मदा॑य पी॒तये॑ ॥२॥

अ॒यम् । वा॒म् । परि॑ । सि॒च्य॒ते॒ । सोमः॑ । इ॒न्द्रा॒बृ॒ह॒स्प॒ती॒ इति॑ । चारुः॒ । मदा॑य । पी॒तये॑ ॥

Mantra without Swara
अयं वां परि षिच्यते सोम इन्द्राबृहस्पती। चारुर्मदाय पीतये ॥

अयम्। वाम्। परि। सिच्यते। सोमः। इन्द्राबृहस्पती इति। चारुः। मदाय पीतये ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 25 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्राबृहस्पती) राजा और उपदेशक विद्वान् जनो ! (वाम्) आप दोनों के मुख में (मदाय) आनन्द के लिये (पीतये) पान करने को (चारुः) अति उत्तम (सोमः) बड़ी ओषधि का रस (अयम्) यह (परि) सब प्रकार से (सिच्यते) सींचा जाता है, इससे आप समर्थ होवें ॥२॥
Essence
जैसे उत्तमान्न सेवन किया जाता, वैसे ही उत्तम रस भी सेवन किया जावे ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥