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Rigveda Mandal 4 / Sukta 48 / Mantra 5

58 Sukta
5 Mantra
4/48/5
Devata- वायु: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वायो॑ श॒तं हरी॑णां यु॒वस्व॒ पोष्या॑णाम्। उ॒त वा॑ ते सह॒स्रिणो॒ रथ॒ आ या॑तु॒ पाज॑सा ॥५॥

वायो॒ इति॑ । श॒तम् । हरी॑णाम् । यु॒वस्व॑ । पोष्या॑णाम् । उ॒त । वा॒ । ते॒ । स॒ह॒स्रिणः॑ । रथः॑ । आ । या॒तु॒ । पाज॑सा ॥

Mantra without Swara
वायो शतं हरीणां युवस्व पोष्याणाम्। उत वा ते सहस्रिणो रथ आ यातु पाजसा ॥

वायो इति शतम्। हरीणाम्। युवस्व। पोष्याणाम्। उत। वा। ते। सहस्रिणः। रथः। आ। यातु। पाजसा ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 24 Mantra » 5

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Meaning
हे (वायो) राजन् ! आप (पोष्याणाम्) पोषण करने योग्य (हरीणाम्) मनुष्यों के (शतम्) असङ्ख्य को (युवस्व) कर्मों के बीच प्रेरणा देओ (उत, वा) अथवा (सहस्रिणः) असंख्य पुरुष और धन से युक्त (ते) आपके (पाजसा) बल से (रथः) वाहन (आ, यातु) सब ओर से प्राप्त हो ॥५॥
Essence
हे राजन् ! जो राज्य करने की इच्छा करो तो उत्तम सहायों का ग्रहण करो ॥५॥ इस सूक्त में राजगुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥५॥ यह अड़तालीसवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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