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Rigveda Mandal 4 / Sukta 48 / Mantra 3

58 Sukta
5 Mantra
4/48/3
Devata- वायु: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अनु॑ कृ॒ष्णे वसु॑धिती ये॒माते॑ वि॒श्वपे॑शसा। वाय॒वा च॒न्द्रेण॒ रथे॑न या॒हि सु॒तस्य॑ पी॒तये॑ ॥३॥

अनु॑ । कृ॒ष्णे । वसु॑धिती॒ इति॒ वसु॑ऽधिती । ये॒माते॒ इति॑ । वि॒श्वऽपे॑शसा । वायो॒ इति॑ । आ । च॒न्द्रेणे॑ । रथे॑न । या॒हि । सु॒तस्य॑ । पी॒तये॑ ॥

Mantra without Swara
अनु कृष्णे वसुधिती येमाते विश्वपेशसा। वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये ॥

अनु। कृष्णे। इति। वसुधिती इति वसुऽधिती। येमाते इति। विश्वऽपेशसा। वायो इति। आ। चन्द्रेण। रथेन। याहि। सुतस्य। पीतये ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 24 Mantra » 3

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Meaning
हे (वायो) राजन् ! जैसे (विश्वपेशसा) सम्पूर्ण उत्तमरूप से (कृष्णे) खींची गई (वसुधिती) सम्पूर्ण लोकों की स्थिति जिनमें वे अन्तरिक्ष और पृथिवी (अनु, येमाते) नियम से चलती हैं, वैसे ही (सुतस्य) उत्पन्न किये गये पदार्थ की (पीतये) रक्षा के लिये (चन्द्रेण) रत्नों से जड़े हुए (रथेन) वाहन के द्वारा आप (आ, याहि) प्राप्त हूजिये ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् ! जैसे भूमि और सूर्य्य बहुत फल देनेवाले वर्त्तमान और नियम से चलते हैं, वैसे बहुत फलों के देनेवाले होकर विद्या और विनय के नियम से निरन्तर जाइये ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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