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Rigveda Mandal 4 / Sukta 46 / Mantra 7

58 Sukta
7 Mantra
4/46/7
Devata- इन्द्रवायू Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ॒ह प्र॒याण॑मस्तु वा॒मिन्द्र॑वायू वि॒मोच॑नम्। इ॒ह वां॒ सोम॑पीतये ॥७॥

इ॒ह । प्र॒ऽयान॑म् । अ॒स्तु॒ । वा॒म् । इन्द्र॑वायू॒ इति॑ । वि॒ऽमोच॑नम् । इ॒ह । वा॒म् । सोम॑ऽपीतये ॥

Mantra without Swara
इह प्रयाणमस्तु वामिन्द्रवायू विमोचनम्। इह वां सोमपीतये ॥

इह। प्रऽयानम्। अस्तु। वाम्। इन्द्रवायू इति। विऽमोचनम्। इह। वाम्। सोमऽपीतये ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 22 Mantra » 7

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्रवायू) वायु और बिजुली के सदृश वर्त्तमान राजा और मन्त्री जनो ! जैसे (इह) इस में (वाम्) आप दोनों का (प्रयाणम्) गमन (अस्तु) हो और जैसे (इह) इस में (वाम्) आप दोनों का (सोमपीतये) सोमपान के लिये (विमोचनम्) त्याग हो, वैसे ही वायु और बिजुली वर्त्तमान हैं, ऐसा जानो ॥७॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो नित्य इधर उधर कार्य्यसिद्धि के लिय जावे और आवे उसी को राजा मानो ॥७॥ इस सूक्त में बिजुली और वायु के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥७॥ यह छियालीसवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥