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Rigveda Mandal 4 / Sukta 46 / Mantra 6

58 Sukta
7 Mantra
4/46/6
Devata- इन्द्रवायू Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इन्द्र॑वायू अ॒यं सु॒तस्तं दे॒वेभिः॑ स॒जोष॑सा। पिब॑तं दा॒शुषो॑ गृ॒हे ॥६॥

इन्द्र॑वायू॒ इति॑ । अ॒यम् । सु॒तः । तम् । दे॒वेभिः॑ । स॒ऽजोष॑सा । पिब॑तम् । दा॒शुषः॑ । गृ॒हे ॥

Mantra without Swara
इन्द्रवायू अयं सुतस्तं देवेभिः सजोषसा। पिबतं दाशुषो गृहे ॥

इन्द्रवायू इति। अयम्। सुतः। तम्। देवेभिः। सऽजोषसा। पिबतम्। दाशुषः। गृहे ॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 22 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सजोषसा) तुल्य प्रीति की कामना करनेवाले (इन्द्रवायू) सूर्य्य और वायु के सदृश अध्यापक और उपदेशको ! जो (अयम्) यह (दाशुषः) दाता जन के (गृहे) गृह में (सुतः) उत्पन्न किया गया (तम्) उसको (देवेभिः) विद्वानों वा श्रेष्ठ पदार्थों के साथ जैसे (पिबतम्) पान करो, वैसे ही सूर्य्य और वायु सब से रस पीते हैं ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य और पवन सब के उपकार को निरन्तर करते हैं, वैसे ही विद्वानों को करना चाहिये ॥६॥
Subject
अब सूर्य्ययुक्त वायु विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥