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Rigveda Mandal 4 / Sukta 46 / Mantra 3

58 Sukta
7 Mantra
4/46/3
Devata- इन्द्रवायू Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ वां॑ स॒हस्रं॒ हर॑य॒ इन्द्र॑वायू अ॒भि प्रयः॑। वह॑न्तु॒ सोम॑पीतये ॥३॥

आ । वा॒म् । स॒हस्र॑म् । हर॑यः । इन्द्र॑वायू॒ इति॑ । अ॒भि । प्रयः॑ । वह॑न्तु । सोम॑ऽपीतये ॥

Mantra without Swara
आ वां सहस्रं हरय इन्द्रवायू अभि प्रयः। वहन्तु सोमपीतये ॥

आ। वाम्। सहस्रम्। हरयः। इन्द्रवायू इति। अभि। प्रयः। वहन्तु। सोमऽपीतये ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 22 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्रवायू) सूर्य्य और पवन ! जो (हरयः) हरनेवाले मनुष्य (वाम्) आप दोनों को (सोमपीतये) सोमलता के पान करने के लिये (सहस्रम्) असंख्य (प्रयः) मनोहर भाव जैसे हों वैसे (आ, वहन्तु) प्राप्त करें, उनको आप दोनों (अभि) सब ओर से बोध दीजिये ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो विद्वान् जन आप लोगों को पढ़ाय और उत्तम प्रकार शिक्षा देकर विद्वान् करते हैं, उनकी निरन्तर सेवा करो ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥