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Rigveda Mandal 4 / Sukta 46 / Mantra 2

58 Sukta
7 Mantra
4/46/2
Devata- इन्द्रवायू Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
श॒तेना॑ नो अ॒भिष्टि॑भिर्नि॒युत्वाँ॒ इन्द्र॑सारथिः। वायो॑ सु॒तस्य॑ तृम्पतम् ॥२॥

श॒तेन॑ । नः॒ । अ॒भिष्टि॑ऽभिः । नि॒युत्वा॑न् । इन्द्र॑ऽसारथिः । वायो॒ इति॑ । सु॒तस्य॑ । तृ॒म्प॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
शतेना नो अभिष्टिभिर्नियुत्वाँ इन्द्रसारथिः। वायो सुतस्य तृम्पतम् ॥

शतेन। नः। अभिष्टिऽभिः। नियुत्वान्। इन्द्रऽसारथिः। वायो इति। सुतस्य। तृम्पतम् ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 22 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वायो) वायुवद्वर्त्तमान विज्ञानयुक्त अध्यापक और उपदेशक ! (अभिष्टिभिः) अभीष्ट क्रियाओं से जैसे (इन्द्रसारथिः) बिजुलीरूप सारथि जिसका वह (नियुत्वान्) बलवान् समर्थ वायु (शतेना) असङ्ख्य से (नः) हम लोगों को तृप्त करता है, वैसे (सुतस्य) उत्पन्न किये गये के सम्बन्ध में आप दोनों (तृम्पतम्) तृप्त होओ ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे वायु के साथ बिजुली, बिजुली के साथ वायु अनेक क्रियाओं को उत्पन्न करते हैं, वैसे पृथिवी और जलादिकों से आप अनेक कार्य्यों को सिद्ध करो ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥