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Rigveda Mandal 4 / Sukta 46 / Mantra 1

58 Sukta
7 Mantra
4/46/1
Devata- इन्द्रवायू Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अग्रं॑ पिबा॒ मधू॑नां सु॒तं वा॑यो॒ दिवि॑ष्टिषु। त्वं हि पू॑र्व॒पा असि॑ ॥१॥

अग्र॑म् । पि॒ब॒ । मधू॑नाम् । सु॒तम् । व॒यो॒ इति॑ । दिवि॑ष्टिषु । त्वम् । हि । पू॒र्व॒ऽपाः । असि॑ ॥

Mantra without Swara
अग्रं पिबा मधूनां सुतं वायो दिविष्टिषु। त्वं हि पूर्वपा असि ॥

अग्रम्। पिब। मधूनाम्। सुतम्। वायो। इति। दिविष्टिषु। त्वम्। हि। पूर्वऽपाः। असि ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 22 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वायो) वायु के सदृश बलयुक्त (हि) जिससे (त्वम्) आप (दिविष्टिषु) श्रेष्ठ क्रियाओं में (पूर्वपाः) पूर्व वर्त्तमान जनों का पालन करनेवाले (असि) हो इससे (मधूनाम्) मधुर रसों के बीच में (अग्रम्) उत्तम (सुतम्) उत्पन्न किये गये रस का (पिबा) पान कीजिये ॥१॥
Essence
हे विद्वन् ! जिससे आप सनातन विद्याओं की रक्षा करके सब के लिये देते हो, इससे आप इन क्रियाओं में मुखिया होते हैं ॥१॥
Subject
अब सात ऋचावाले छियालीसवें सूक्त का आरम्भ हैं उसके प्रथम मन्त्र में बिजुली की विद्या के विषय को कहते हैं ॥