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Rigveda Mandal 4 / Sukta 45 / Mantra 7

58 Sukta
7 Mantra
4/45/7
Devata- अश्विनौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र वा॑मवोचमश्विना धियं॒धा रथः॒ स्वश्वो॑ अ॒जरो॒ यो अस्ति॑। येन॑ स॒द्यः परि॒ रजां॑सि या॒थो ह॒विष्म॑न्तं त॒रणिं॑ भो॒जमच्छ॑ ॥७॥

प्र । वा॒म् । अ॒वो॒च॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । धि॒य॒म्ऽधाः । रथः॑ । सु॒ऽअश्वः॑ । अ॒जरः॑ । यः । अस्ति॑ । येन॑ । स॒द्यः । परि॑ । रजां॑सि । या॒थः । ह॒विष्म॑न्तम् । त॒रणि॑म् । भो॒जम् । अच्छ॑ ॥

Mantra without Swara
प्र वामवोचमश्विना धियंधा रथः स्वश्वो अजरो यो अस्ति। येन सद्यः परि रजांसि याथो हविष्मन्तं तरणिं भोजमच्छ ॥

प्र। वाम्। अवोचम्। अश्विना। धियम्ऽधाः। रथः। सुऽअश्वः। अजरः। यः। अस्ति। येन। सद्यः। परि। रजांसि। याथः। हविष्मन्तम्। तरणिम्। भोजम्। अच्छ ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 7

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Meaning
हे (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक जनो ! (यः) जो (स्वश्वः) उत्तमोत्तम घोड़ों से युक्त (अजरः) वृद्धावस्थारहित (रथः) सुन्दर वाहन (अस्ति) है उसकी विद्या को (धियन्धाः) बुद्धि अर्थात शिल्पविद्या रूप कर्म को धारण करनेवाला मैं (वाम्) आप दोनों को (प्र, अवोचम्) उत्तम उपदेश करूँ (येन) जिससे आप दोनों (हविष्मन्तम्) बहुत सामग्री से युक्त (तरणिम्) तारनेवाले (भोजम्) खाने योग्य पदार्थ और (रजांसि) लोक वा ऐश्वर्य्यों को (सद्यः) शीघ्र (अच्छ) उत्तम प्रकार (परि, याथः) सब ओर से प्राप्त होते हैं ॥७॥
Essence
हे मनुष्यो ! विद्वान् हम लोग आप लोगों को जिन शिल्पविद्याओं का ग्रहण करावें, उन विद्याओं से आप लोग विमान आदि वाहनों को रच शीघ्र गमन और आगमन को करके बहुत भोगों को प्राप्त होओ ॥७॥ इस सूक्त में सूर्य और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥७॥ यह पैंतालीसवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग और चौथा अनुवाक समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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