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Rigveda Mandal 4 / Sukta 45 / Mantra 5

58 Sukta
7 Mantra
4/45/5
Devata- अश्विनौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स्व॒ध्व॒रासो॒ मधु॑मन्तो अ॒ग्नय॑ उ॒स्रा ज॑रन्ते॒ प्रति॒ वस्तो॑र॒श्विना॑। यन्नि॒क्तह॑स्तस्त॒रणि॑र्विचक्ष॒णः सोमं॑ सु॒षाव॒ मधु॑मन्त॒मद्रि॑भिः ॥५॥

सु॒ऽअ॒ध॒रासः॑ । मधु॑ऽमन्तः । अ॒ग्नयः॑ । उ॒स्रा । ज॒र॒न्ते॒ । प्रति॑ । वस्तोः॑ । अ॒श्विना॑ । यत् । नि॒क्तऽह॑स्तः । त॒रणिः॑ । वि॒ऽच॒क्ष॒णः । सोम॑म् । सु॒साव॑ । मधु॑ऽमन्तम् । अद्रि॑ऽभिः ॥

Mantra without Swara
स्वध्वरासो मधुमन्तो अग्नय उस्रा जरन्ते प्रति वस्तोरश्विना। यन्निक्तहस्तस्तरणिर्विचक्षणः सोमं सुषाव मधुमन्तमद्रिभिः ॥

सुऽअध्वरासः। मधुऽमन्तः। अग्नयः। उस्रा। जरन्ते। प्रति। वस्तोः। अश्विना। यत्। निक्तऽहस्तः। तरणिः। विऽचक्षणः। सोमम्। सुसाव। मधुऽमन्तम्। अद्रिऽभिः ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) राजा और मन्त्री जनो ! जैसे (प्रति, वस्तोः) प्रतिदिन की (स्वध्वरासः) उत्तम प्रकार क्रियायोगों की सिद्धियाँ जिनसे वे (मधुमन्तः) मधुर आदि गुणों से युक्त (अग्नयः) अग्नि (उस्रा) किरणों की (जरन्ते) स्तुति करते अर्थात् उन्हें प्रशंसित करते हैं और (यत्) जो (निक्तहस्तः) शुद्ध हाथों युक्त (तरणिः) दुःखों से पार करनेवाला (विचक्षणः) अत्यन्त बुद्धिमान् (अद्रिभिः) मेघों से (मधुमन्तम्) मधुर आदि गुणयुक्त (सोमम्) ओषधियों के समूह को (सुषाव) उत्पन्न करता है, उन और उसको आप दोनों सिद्ध करो ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! आप लोग शिल्पी विद्वानों के सङ्ग से अग्नि आदि और सोमलता आदि पदार्थों को जान के और अच्छे प्रकार प्रयोग करके अभीष्ट कार्य्यों को सिद्ध करो ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥