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Rigveda Mandal 4 / Sukta 45 / Mantra 3

58 Sukta
7 Mantra
4/45/3
Devata- अश्विनौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
मध्वः॑ पिबतं मधु॒पेभि॑रा॒सभि॑रु॒त प्रि॒यं मधु॑ने युञ्जाथां॒ रथ॑म्। आ व॑र्त॒निं मधु॑ना जिन्वथस्प॒थो दृतिं॑ वहेथे॒ मधु॑मन्तमश्विना ॥३॥

मध्वः॑ । पि॒ब॒त॒म् । म॒धु॒ऽपेभिः॑ । आ॒सऽभिः॑ । उ॒त । प्रि॒यम् । मधु॑ने । यु॒ञ्जा॒था॒म् । रथ॑म् । आ । व॒र॒निम् । मधु॑ना । जि॒न्व॒थः॒ । प॒थः । दृति॑म् । व॒हे॒थे॒ इति॑ । मधु॑ऽमन्तम् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥

Mantra without Swara
मध्वः पिबतं मधुपेभिरासभिरुत प्रियं मधुने युञ्जाथां रथम्। आ वर्तनिं मधुना जिन्वथस्पथो दृतिं वहेथे मधुमन्तमश्विना ॥

मध्वः। पिबतम्। मधुऽपेभिः। आसऽभिः। उत। प्रियम्। मधुने। युञ्जाथाम्। रथम्। आ। वर्तनिम्। मधुना। जिन्वथः। पथः। दृतिम्। वहेथे इति। मधुऽमन्तम्। अश्विना ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 3

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Meaning
हे (अश्विना) सेना के ईश और योद्धा जन आप दोनों (मधुपेभिः) मधुर रसों को पीनेवाले वीर पुरुषों के साथ (आसभिः) मुखों से (मध्वः) मधुर आदि गुण से युक्त पदार्थ के (प्रियम्) मनोहर रस को (पिबतम्) पिओ (उत) और (मधुने) जाने गये मार्ग के लिये (रथम्) विमान आदि वाहन को (युञ्जाथाम्) युक्त करो तथा (मधुना) मधुरता गुण युक्त पदार्थ से (वर्त्तनिम्) जिसमें वर्त्तमान होते उस मार्ग को (आ, जिन्वथः) सब प्रकार प्राप्त होते हो और अन्य (पथः) मार्गों को प्राप्त होते हो और जैसे (मधुमन्तम्) मधुर आदि गुणों से युक्त (दृतिम्) जल के चर्मपात्र के सदृश वर्त्तमान मेघ को सूर्य्य और वायु (वहेथे) धारण करते हैं, वैसे इस व्यवहार को धारण करो ॥३॥
Essence
हे सेना के ईश और योद्धाजनो ! तुम सेनास्थ वीरों के साथ ऐसे भोजन करो और वाहनों को रचो, जिनसे बल की वृद्धि और लक्ष्मी की प्राप्ति हो, जैसे वायु और बिजुली वर्षा करके सबको सुखी करते हैं, वैसे प्रजा को सुखी करो ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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