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Rigveda Mandal 4 / Sukta 45 / Mantra 2

58 Sukta
7 Mantra
4/45/2
Devata- अश्विनौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उद्वां॑ पृ॒क्षासो॒ मधु॑मन्त ईरते॒ रथा॒ अश्वा॑स उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टिषु। अ॒पो॒र्णु॒वन्त॒स्तम॒ आ परी॑वृतं॒ स्व१॒॑र्ण शु॒क्रं त॒न्वन्त॒ आ रजः॑ ॥२॥

उत् । वा॒म् । पृ॒क्षासः॑ । मधु॑ऽमन्तः । ई॒र॒ते॒ । रथाः॑ । अश्वा॑सः । उ॒षसः॑ । विऽउ॑ष्टिषु । अ॒प॒ऽऊ॒र्णु॒वन्तः॑ । तन्मः॑ । आ । परि॑ऽवृतम् । स्वः॑ । न । शु॒क्रम् । त॒न्वन्तः॑ । आ । रजः॑ ॥

Mantra without Swara
उद्वां पृक्षासो मधुमन्त ईरते रथा अश्वास उषसो व्युष्टिषु। अपोर्णुवन्तस्तम आ परीवृतं स्व१र्ण शुक्रं तन्वन्त आ रजः ॥

उत्। वाम्। पृक्षासः। मधुऽमन्तः। ईरते। रथाः। अश्वासः। उषसः। विऽउष्टिषु। अपऽऊर्णुवन्तः। तमः। आ। परिऽवृतम्। स्वः। न। शुक्रम्। तन्वन्तः। आ। रजः ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे अध्यापक और उपदेशक जनो ! जैसे (मधुमन्तः) मधुर आदि गुणों से युक्त (पृक्षासः) उत्तम प्रकार सींचे गये (उषसः) प्रभात वेला की (तमः) रात्रि को (अपोर्णुवन्तः) निवारण करते अर्थात् हटाते हुए (व्युष्टिषु) अनेक प्रकार की सेवाओं में (रथाः) वाहनों और (अश्वासः) घोड़ों के सदृश (आ, परीवृतम्) सब प्रकार से घिरे हुए को (स्वः) सूर्य्य के (न) सदृश (शुक्रम्) शुद्ध (आ, रजः) लोक-लोकान्तर को (तन्वन्तः) विस्तृत करते हुए सूर्य्यकिरण (वाम्) आप दोनों को (उत्, ईरते) कँपते, चञ्चल होते, ऊपर से प्राप्त होते हैं, उनको आप लोग विशेष करके जानो ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! ये सब लोक सूर्य्य के सब ओर घूमते हैं और जैसे सूर्य्य की किरणें भूगोल के आधे भाग में स्थित अन्धकार को निवारण करके प्रकाश उत्पन्न करते हैं, वैसे ही विद्वान् जन विद्या के दान से अविद्या को निवारण करके विद्या को उत्पन्न करें ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥