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Rigveda Mandal 4 / Sukta 45 / Mantra 1

58 Sukta
7 Mantra
4/45/1
Devata- अश्विनौ Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ए॒ष स्य भा॒नुरुदि॑यर्ति यु॒ज्यते॒ रथः॒ परि॑ज्मा दि॒वो अ॒स्य सान॑वि। पृ॒क्षासो॑ अस्मिन्मिथु॒ना अधि॒ त्रयो॒ दृति॑स्तु॒रीयो॒ मधु॑नो॒ वि र॑प्शते ॥१॥

ए॒षः । स्यः । भा॒नुः । उत् । इ॒य॒र्ति॒ । यु॒ज्यते॑ । रथः॑ । परि॑ऽज्मा । दि॒वः । अ॒स्य । सान॑वि । पृ॒क्षासः॑ । अ॒स्मि॒न् । मि॒थु॒नाः । अधि॑ । त्रयः॑ । दृतिः॑ । तु॒रीयः॑ । मधु॑नः । वि । र॒प्श॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
एष स्य भानुरुदियर्ति युज्यते रथः परिज्मा दिवो अस्य सानवि। पृक्षासो अस्मिन्मिथुना अधि त्रयो दृतिस्तुरीयो मधुनो वि रप्शते ॥

एषः। स्यः। भानुः। उत्। इयर्ति। युज्यते। रथः। परिऽज्मा। दिवः। अस्य। सानवि। पृक्षासः। अस्मिन्। मिथुनाः। अधि। त्रयः। दृतिः। तुरीयः। मधुनः। वि। रप्शते ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! (एषः, स्यः) सो वह (परिज्मा) सब ओर से भूमि में चलता वा त्यागता (भानुः) सूर्य्य (उत्) ऊपर को (इयर्त्ति) प्राप्त होता है (अस्य) इसके (सानवि) आकाशप्रदेश में (रथः) वाहन (युज्यते) जोड़ा जाता है (अस्मिन्) इस में (त्रयः) वायु, जल और बिजुली (पृक्षासः) सम्बन्ध को प्राप्त (मिथुनाः) दो दो मिले हुए प्रकाशित होते हैं इस (मधुनः) मधुर गुण से युक्त के बीच (तुरीयः) चौथा (दृतिः) मेघ (दिवः) प्रशंसायुक्त अन्तरिक्ष के बीच (अधि) ऊपर (वि, रप्शते) विशेष करके शोभित होता है, उन सबको जानिये ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो प्रकाशमान सूर्य्य ब्रह्माण्ड के मध्य में विराजित है और इसके चारों ओर बहुत भूगोल सम्बन्धयुक्त हैं तथा पृथिवी और चन्द्रलोक एक साथ घूमते हैं और जिसके प्रभाव से वृष्टियाँ होती हैं, इस सम्पूर्ण को जानो ॥१॥
Subject
अब सात ऋचावाले पैंतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र से सूर्य्यविषय को कहते हैं ॥

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