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Rigveda Mandal 4 / Sukta 44 / Mantra 3

58 Sukta
7 Mantra
4/44/3
Devata- अश्विनौ Rishi- पुरुमीळहाजमीळहौ सौहोत्रौ Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
को वा॑म॒द्या क॑रते रा॒तह॑व्य ऊ॒तये॑ वा सुत॒पेया॑य वा॒र्कैः। ऋ॒तस्य॑ वा व॒नुषे॑ पू॒र्व्याय॒ नमो॑ येमा॒नो अ॑श्वि॒ना व॑वर्तत् ॥३॥

कः । वा॒म् । अ॒द्य । का॒र॒ते॒ । रा॒तऽह॑व्यः । ऊ॒तये॑ । वा॒ । सु॒त॒ऽपेया॑य । वा॒ । अ॒र्कैः । ऋ॒तस्य॑ । वा॒ । व॒नुषे॑ । पू॒र्व्याय॑ । नमः॑ । ये॒मा॒नः । अ॒श्वि॒ना॒ । आ । व॒व॒र्त॒त् ॥

Mantra without Swara
को वामद्या करते रातहव्य ऊतये वा सुतपेयाय वार्कैः। ऋतस्य वा वनुषे पूर्व्याय नमो येमानो अश्विना ववर्तत् ॥

कः। वाम्। अद्य। करते। रातऽहव्यः। ऊतये। वा। सुतऽपेयाय। वा। अर्कैः। ऋतस्य। वा। वनुषे। पूर्व्याय। नमः। येमानः। अश्विना। आ। ववर्तत् ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 20 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक जनो ! (अद्या) आज (वाम्) आप दोनों को (कः) कौन (रातहव्यः) देने योग्य को दिये हुए (ऊतये) रक्षण आदि के लिये (वा) वा आज (सुतपेयाय) उत्पन्न जो पीने योग्य रस उसके लिये (करते) करता अर्थात् प्रयत्नयुक्त करता (वा) वा (अर्कैः) सत्कारों से सत्कार करता (वा) वा (ऋतस्य) सत्य के सम्बन्ध में (पूर्व्याय) प्राचीन जनों में चतुर के लिये (नमः) अन्न को देता और अनुकूल हुआ (आ, ववर्त्तत्) वर्त्ताव करता है, उसका (येमानः) जो नियम करते हुए सत्कार करते हैं, उनका आप दोनों सत्कार करें । और हे विद्वन् ! जिस कारण आप इन दोनों से विद्या को (वनुषे) माँगते हो, इससे इन दोनों का निरन्तर सत्कार करो ॥३॥
Essence
हे अध्यापक और उपदेशक जनो ! जो आप दोनों का सत्कार करें, उनको उत्तम प्रकार शिक्षित और सभ्य अर्थात् सभा के योग्य करो और जिनसे विद्या का ग्रहण कराओ, उनका निरन्तर सत्कार भी करो ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥