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Rigveda Mandal 4 / Sukta 44 / Mantra 1

58 Sukta
7 Mantra
4/44/1
Devata- अश्विनौ Rishi- पुरुमीळहाजमीळहौ सौहोत्रौ Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तं वां॒ रथं॑ व॒यम॒द्या हु॑वेम पृथु॒ज्रय॑मश्विना॒ संग॑तिं॒ गोः। यः सू॒र्यां वह॑ति वन्धुरा॒युर्गिर्वा॑हसं पुरु॒तमं॑ वसू॒युम् ॥१॥

तम् । वा॒म् । रथ॑म् । व॒यम् । अ॒द्य । हु॒वे॒म॒ । पृ॒थु॒ऽज्रय॑म् । अ॒श्वि॒ना॒ । सम्ऽग॑तिम् । गोः । यः । सू॒र्याम् । वह॑ति । व॒न्धु॒र॒ऽयुः । गिर्वा॑हसम् । पु॒रु॒ऽतम॑म् । व॒सु॒ऽयुम् ॥

Mantra without Swara
तं वां रथं वयमद्या हुवेम पृथुज्रयमश्विना संगतिं गोः। यः सूर्यां वहति वन्धुरायुर्गिर्वाहसं पुरुतमं वसूयुम् ॥

तम्। वाम्। रथम्। वयम्। अद्य। हुवेम। पृथुऽज्रयम्। अश्विना। सम्ऽगतिम्। गोः। यः। सूर्याम्। वहति। वन्धुरऽयुः। गिर्वाहसम्। पुरुऽतमम्। वसुऽयुम् ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 20 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक जनो ! (वयम्) हम लोग (अद्या) आज (वाम्) तुम दोनों के (पृथुज्रयम्) विस्तीर्ण और बहुत गतिवाले (तम्) उस (रथम्) रमण करने योग्य वाहन को (हुवेम) ग्रहण करें और (गोः) पृथिवी के (सङ्गतिम्) सङ्ग को ग्रहण करें (यः) जो (वन्धुरायुः) थोड़ी अवस्थावाला (सूर्य्याम्) सूर्य्यसम्बन्धिनी कान्ति अर्थात् तेज की (वहति) प्राप्ति करता है जिस (पुरुतमम्) बहुतों को ग्लानि करने (गिर्वाहसम्) वाणी से प्राप्त करने वा प्राप्त होने (वसूयुम्) और अपने को द्रव्य की इच्छा करनेवाले का ग्रहण करें, वही सुखी होता है ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस अग्नि और जल से शिल्पविद्या ही साधन जिसका ऐसा रथ आदि उत्पन्न किया जाता है, वही अपने आत्मा के तुल्य सब को प्रसन्न करता है ॥१॥
Subject
अब सात ऋचावाले चवालीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अध्यापक और उपदेशकविषय में शिल्पविद्याविषय को कहते हैं ॥