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Rigveda Mandal 4 / Sukta 42 / Mantra 9

58 Sukta
10 Mantra
4/42/9
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- त्रसदस्युः पौरुकुत्स्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पु॒रु॒कुत्सा॑नी॒ हि वा॒मदा॑शद्ध॒व्येभि॑रिन्द्रावरुणा॒ नमो॑भिः। अथा॒ राजा॑नं त्र॒सद॑स्युमस्या वृत्र॒हणं॑ ददथुरर्धदे॒वम् ॥९॥

पु॒रु॒ऽकुत्सा॑नी । हि । वा॒म् । अदा॑शत् । ह॒व्येभिः॑ । इ॒न्द्रा॒व॒रु॒णा॒ । नमः॑ऽभिः । अथ॑ । राजा॑नम् । त्र॒सद॑स्युम् । अ॒स्याः॒ । वृ॒त्र॒ऽहन॑म् । द॒द॒थुः॒ । अ॒र्ध॒ऽदे॒वम् ॥

Mantra without Swara
पुरुकुत्सानी हि वामदाशद्धव्येभिरिन्द्रावरुणा नमोभिः। अथा राजानं त्रसदस्युमस्या वृत्रहणं ददथुरर्धदेवम् ॥

पुरुऽकुत्सानी। हि। वाम्। अदाशत्। हव्येभिः। इन्द्रावरुणा। नमःऽभिः। अथ। राजानम्। त्रसदस्युम्। अस्याः। वृत्रऽहनम्। ददथुः। अर्धऽदेवम् ॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 18 Mantra » 4

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Meaning
हे (इन्द्रावरुणा) वायु और बिजुली के सदृश वर्त्तमान ! जो (पुरुकुत्सानी) बहुत निन्दित कर्मों से विशिष्ट (हव्येभिः) ग्रहण करने योग्य (नमोभिः) अन्नादिकों से आप दोनों को सुख (अदाशत्) देती है (अथा) इसके अनन्तर (अस्याः) इस पृथिवी के (वृत्रहणम्) मेघ को नाश करने और (अर्द्धदेवम्) आधे जगत् को प्रकाश करनेवाले सूर्य्य के सदृश (त्रसदस्युम्) जिससे दुष्ट डाकू जन डरते हैं उस (राजानम्) राजा को (वाम्) आप दोनों (ददथुः) दीजिये उसको और उनको (हि) जिससे हम लोग जानें ॥९॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिसकी कृपा से सम्पूर्ण पृथिवी धान्य से युक्त हुई और सूर्य्य प्रकट हुआ, उसकी निरन्तर उपासना करो ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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