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Rigveda Mandal 4 / Sukta 42 / Mantra 7

58 Sukta
10 Mantra
4/42/7
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- त्रसदस्युः पौरुकुत्स्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि॒दुष्टे॒ विश्वा॒ भुव॑नानि॒ तस्य॒ ता प्र ब्र॑वीषि॒ वरु॑णाय वेधः। त्वं वृ॒त्राणि॑ शृण्विषे जघ॒न्वान्त्वं वृ॒ताँ अ॑रिणा इन्द्र॒ सिन्धू॑न् ॥७॥

वि॒दुः । ते॒ । विश्वा॑ । भुव॑नानि । तस्य॑ । ता । प्र । ब्र॒वी॒षि॒ । वरु॑णाय । वे॒धः॒ । त्वम् । वृ॒त्राणि॑ । शृ॒ण्वि॒षे॒ । ज॒घ॒न्वान् । त्वम् । वृ॒ताम् । अ॒रि॒णाः॒ । इ॒न्द्र॒ । सिन्धू॑न् ॥

Mantra without Swara
विदुष्टे विश्वा भुवनानि तस्य ता प्र ब्रवीषि वरुणाय वेधः। त्वं वृत्राणि शृण्विषे जघन्वान्त्वं वृताँ अरिणा इन्द्र सिन्धून् ॥

विदुः। ते। विश्वा। भुवनानि। तस्य। ता। प्र। ब्रवीषि। वरुणाय। वेधः। त्वम्। वृत्राणि। शृण्विषे। जघन्वान्। त्वम्। वृतान्। अरिणाः। इन्द्र। सिन्धून् ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 18 Mantra » 2

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Meaning
हे (वेधः) अनन्तविद्यायुक्त (इन्द्र) अतीव ऐश्वर्य्य के दाता जगदीश्वर ! जो (त्वम्) आप (वरुणाय) श्रेष्ठ जन के लिये वेदों का (प्र, ब्रवीषि) उपदेश देते हो (तस्य) उन (ते) आप का (ता) उन (विश्वा) सम्पूर्ण (भुवनानि) लोकों को विद्वान् जन राज्य (विदुः) जानते हैं और जो (त्वम्) आप (वृत्राणि) धनों को (शृण्विषे) सुनते हो (सिन्धून्) समुद्र वा नदियों को और (वृतान्) स्वीकार किये हुओं को (अरिणाः) प्राप्त होओ, वह आप दुष्ट अधर्मियों के (जघन्वान्) नाशकारी हो ॥७॥
Essence
हे परमेश्वर ! जिससे आपने कृपा करके हम लोगों के कल्याण के लिये वेदों का उपदेश किया, जिससे हम लोगों के दोष नाश किये गये और वर्षा के द्वारा पालन किया जाता है, उस ही की हम लोग उपासना करते हैं ॥७॥
Subject
अब ईश्वरोपासना विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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