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Rigveda Mandal 4 / Sukta 42 / Mantra 5

58 Sukta
10 Mantra
4/42/5
Devata- आत्मा Rishi- त्रसदस्युः पौरुकुत्स्यः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
मां नरः॒ स्वश्वा॑ वा॒जय॑न्तो॒ मां वृ॒ताः स॒मर॑णे हवन्ते। कृ॒णोम्या॒जिं म॒घवा॒हमिन्द्र॒ इय॑र्मि रे॒णुम॒भिभू॑त्योजाः ॥५॥

माम् । नरः॑ । सु॒ऽअश्वाः॑ । वा॒जऽय॑न्तः । माम् । वृ॒ताः । स॒म्ऽअर॑णे । ह॒व॒न्ते॒ । कृ॒णोमि॑ । आ॒जिम् । म॒घऽवा॑ । अ॒हम् । इन्द्रः॑ । इय॑र्मि । रे॒णुम् । अ॒भिभू॑तिऽओजाः ॥

Mantra without Swara
मां नरः स्वश्वा वाजयन्तो मां वृताः समरणे हवन्ते। कृणोम्याजिं मघवाहमिन्द्र इयर्मि रेणुमभिभूत्योजाः ॥

माम्। नरः। सुऽअश्वाः। वाजयन्तः। माम्। वृताः। सम्ऽअरणे। हवन्ते। कृणोमि। आजिम्। मघऽवा। अहम्। इन्द्रः। इयर्मि। रेणुम्। अभिभूतिऽओजाः ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 17 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (स्वश्वाः) सुन्दर घोड़े वा अग्नि आदि जिनके विद्यमान और (माम्) मुझको (वाजयन्तः) जानते वा जनाते हुए (वृताः) स्वीकार जिन्होंने किया वे (नरः) नायक जन (समरणे) संग्राम में (माम्) मेरी (हवन्ते) स्पर्द्धा अर्थात् स्वीकार करते हैं वहाँ (मघवा) अत्यन्त श्रेष्ठ धनयुक्त (इन्द्रः) तेजस्वी (अभिभूत्योजाः) दुष्टों का अभिभव करनेवाले बल से युक्त (अहम्) मैं (आजिम्) संग्राम को (कृणोमि) करता हूँ (रेणुम्) धूलि को (इयर्मि) प्राप्त होता हूँ, वैसे तुम लोग भी मेरा स्वीकार करो ॥५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो जन सब वस्तुओं में प्राप्त होनेवाले, सब के अन्तर्यामि और सर्वशक्तिमान् मुझ परमात्मा की संग्राम में प्रार्थना करते हैं, उन्हीं का मैं विजय कराता हूँ और जो धर्म से युद्ध करते हैं, उन्हीं का मैं सहायक होता हूँ ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥