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Rigveda Mandal 4 / Sukta 42 / Mantra 2

58 Sukta
10 Mantra
4/42/2
Devata- आत्मा Rishi- त्रसदस्युः पौरुकुत्स्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒हं राजा॒ वरु॑णो॒ मह्यं॒ तान्य॑सु॒र्या॑णि प्रथ॒मा धा॑रयन्त। क्रतुं॑ सचन्ते॒ वरु॑णस्य दे॒वा राजा॑मि कृ॒ष्टेरु॑प॒मस्य॑ व॒व्रेः ॥२॥

अ॒हम् । राजा॑ । वरु॑णः । मह्य॑म् । तानि॑ । अ॒सु॒र्या॑णि । प्र॒थ॒मा । धा॒र॒य॒न्त॒ । क्रतु॑म् । स॒च॒न्ते॒ । वरु॑णस्य । दे॒वाः । राजा॑मि । कृ॒ष्टेः । उ॒प॒मस्य॑ । व॒व्रेः ॥

Mantra without Swara
अहं राजा वरुणो मह्यं तान्यसुर्याणि प्रथमा धारयन्त। क्रतुं सचन्ते वरुणस्य देवा राजामि कृष्टेरुपमस्य वव्रेः ॥

अहम्। राजा। वरुणः। मह्यम्। तानि। असुर्याणि। प्रथमा। धारयन्त। क्रतुम्। सचन्ते। वरुणस्य। देवाः। राजामि। कृष्टेः। उपऽमस्यः। वव्रेः ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 17 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे जो (वरुणः) सम्पूर्ण उत्तम प्रबन्धों का कर्त्ता (राजा) प्रकाशमान (अहम्) मैं जगदीश्वर (वरुणस्य) उत्तम सम्बन्ध में और (वव्रेः) स्वीकार करने योग्य (कृष्टेः) मनुष्य के सम्बन्ध में तथा (उपमस्य) उपमायुक्त जगत् के बीच में (राजामि) प्रकाशित होता हूँ उस (मह्यम्) मेरे लिये (देवाः) विद्वान् जन तृप्त होते हैं तथा जो (प्रथमा) आदि से वर्त्तमान (असुर्य्याणि) मेघादिकों के चिह्न (तानि) उनको (धारयन्त) धारण करते हैं और (क्रतुम्) बुद्धि को (सचन्ते) प्राप्त होते हैं, वैसे तुम लोग भी आचरण करो ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सर्वत्र व्याप्त, बुद्धि और धन के देनेवाले जगत् के स्वामी मुझ परमात्मा को भजते हैं, वे सब सुखों को भजते हैं ॥२॥
Subject
अब ईश्वरविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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